सुप्रीम कोर्ट बोला- रिलेशनशिप टूटने के बाद रेप केस गलत:  इससे आरोपी की छवि खराब होती है, न्याय व्यवस्था पर भी बोझ पड़ता है
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सुप्रीम कोर्ट बोला- रिलेशनशिप टूटने के बाद रेप केस गलत: इससे आरोपी की छवि खराब होती है, न्याय व्यवस्था पर भी बोझ पड़ता है

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नई दिल्ली5 घंटे पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ शादी का वादा तोड़ने को झूठा वादा नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोपी की तरफ से रिश्ते की शुरुआत से ही धोखाधड़ी का इरादा न हो। - Dainik Bhaskar

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ शादी का वादा तोड़ने को झूठा वादा नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोपी की तरफ से रिश्ते की शुरुआत से ही धोखाधड़ी का इरादा न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में कहा कि यदि दो वयस्कों में सहमति से बना रिश्ता बाद में टूट जाता है या दोनों के बीच दूरी आ जाती है, तो इसे शादी का झूठा वादा बताकर रेप का केस नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों से न केवल न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ता है, बल्कि आरोपी व्यक्ति की सामाजिक छवि को भी गंभीर नुकसान होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ शादी का वादा तोड़ने को झूठा वादा नहीं माना जा सकता, जब तक कि आरोपी की तरफ से रिश्ते की शुरुआत से ही धोखाधड़ी का इरादा न हो। बेंच ने कहा कि शादी का वादा तोड़ने को झूठा वादा बताकर धारा 376 के तहत रेप का केस करना गलत है। इस प्रवृत्ति पर पहले भी चिंता जताई जा चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ ही महाराष्ट्र के अमोल भगवान नेहुल के खिलाफ रेप केस रद्द कर दिया। आरोपी नेहुल ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उस पर दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटते हुए आपराधिक कार्यवाही खत्म की।

कोर्ट ने लिव इन के बाद रेप के आरोप को भी गलत बताया था इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में एक मामले में कहा था कि 16 साल तक लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद कोई महिला रेप का आरोप नहीं लगा सकती। सिर्फ शादी करने का वादा तोड़ने से रेप का मामला नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो जाए कि शुरुआत से ही शादी की कोई मंशा नहीं थी।

महिला ने 2022 में अपने पूर्व लिवइन पार्टनर पर रेप का केस दर्ज कराया था। उसका आरोप था कि 2006 में पार्टनर जबरदस्ती उसके घर में घुसा और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में शादी का झांसा देकर 16 साल तक उसका शोषण किया। फिर किसी दूसरी महिला से शादी कर ली।

कोर्ट बोला- पढ़ी-लिखी महिला इतने साल धोखे में कैसे रह सकती है जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर कोई महिला इतने समय तक रिश्ते में रहती है, तो इसे धोखा या जबरदस्ती नहीं कहा जा सकता है। यह मामला लिव इन रिलेशनशिप के बिगड़ने का है, न कि रेप का।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिला इतने सालों तक किसी के धोखे में कैसे रह सकती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि जब अचानक उसका पार्टनर किसी और से शादी कर ले, तब केस दर्ज कराए। कोर्ट ने मामला खत्म करते हुए कहा कि केस जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

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