4 घंटे पहले
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सुशील दोशी पद्मश्री से सम्मानित कमेंटेटर
दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल के “भगवान’ कहलाने वाले लियोनल मेसी की भारत यात्रा ने दीवानगी के नए कीर्तिमान स्थापित करने के साथ ही विवाद भी खड़े किए। कोलकाता, हैदराबाद, मुम्बई, दिल्ली में स्टेडियम तो भरे रहे, पर साथ ही फिल्मी सितारों, राजनीतिज्ञों व उद्योगपतियों में इस वैश्विक सितारे के इर्द-गिर्द मंडराने की होड़ लगी रही।
कोलकाता तो अपने फुटबॉल प्रेम के लिए विख्यात है। साल्ट लेक स्टेडियम पर अपर्याप्त व्यवस्था के चलते अफरा-तफरी मच गई। जिन दर्शकों ने 25000 रुपए तक में टिकट खरीदे थे, वे मेसी की एक झलक भी न पा सके। उन्होंने अपने को ठगा हुआ महसूस किया।
राजनीति व फिल्म-जगत के सितारे तो मेसी के साथ फोटो खिंचवाते रहे, पर फुटबॉल के सच्चे प्रेमी दर्शक अपने सितारे को देख भी न सके। नाराज दर्शकों ने तोड़-फोड़ शुरू कर दी और ममता सरकार को भारी बदनामी झेलनी पड़ी, क्योंकि मेसी 20 मिनट में ही वापस चले गए। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक शतद्रु दत्ता सहित 6 लोगों को गिरफ्तार किया व एसआईटी की जांच बैठा दी गई। मुख्यमंत्री ने माफी भी मांगी।
होना तो यह चाहिए था कि मेसी को एक खुली जीप या गाड़ी में बैठाकर स्टेडियम का चक्कर और फुटबॉल को किक लगवा लेना था। दर्शक तृप्त हो जाते। कोलकाता में दर्शक न तो शाहरुख खान को देखने आए थे और न ही अन्य सितारों व राजनीतिज्ञों को।
अलबत्ता कोलकाता के बाद हैदराबाद, मुम्बई व नई दिल्ली में टूर व्यवस्थित रहा। मुम्बई में जब मेसी की अगवानी “क्रिकेट के भगवान’ सचिन तेंदुलकर ने की तो दोनों का भावुक मिलन व जर्सियों का आदान-प्रदान देख दर्शक तृप्त हो गए।
मेसी के साथ लुई सुआरेज व रोड्रिगो डी’पॉल भी थे और भारतीय लोकप्रिय फुटबॉलर सुनील छेत्री जब उनसे मिले तो सभी अभिभूत रह गए। भारत फुटबॉल में विश्व में 142वें स्थान पर है, पर इसके बावजूद फुटबॉल का जुनून उमड़ता नजर आया।
मैसेज साफ था कि मेसी एक खिलाड़ी व व्यक्ति से ऊपर उठकर एक वैश्विक ‘ब्रांड’ बन गए हैं। आप ‘सुपरस्टार’ संस्कृति से छुटकारा पा ही नहीं सकते। खेल को कायम रखने व दर्शकों को निरंतर आकर्षित करते रहने की ताकत के कारण ऐसे सितारों की जरूरत भी रहती है।
लेकिन भारत के ओलिंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा ने इस आयोजन के प्रति निराशा जाहिर की कि इससे भारत को क्या हासिल हुआ? इतने धन से तो भारतीय खेलों के विकास को गति मिल सकती थी। यहां मैं बिंद्रा से असहमत हूं। महान खिलाड़ी देश व सीमा से परे होते हैं। कला हमेशा कालजयी होती है।
मेसी, पेले, तेंदुलकर, गावस्कर, ध्यानचंद, ब्रैडमेन जैसे खिलाड़ी दुनिया की धरोहर होते हैं। हुनर, कला व प्रतिभा का सम्मान ही स्वस्थ समाज व दुनिया की रचना करता है। अगर लियोनल मेसी को देखकर भारतीय युवा प्रेरित होते हैं, तो इसमें बुराई क्या है?
महान खिलाड़ी अपने देश व स्वाभिमान का प्रतीक भी होता है। उसका व्यवहार, विनम्रता व चरित्र दूसरों को प्रेरित करता है। मेसी अर्जेंटीना के खिलाड़ी हैं तो उन्होंने अपनी मातृभाषा स्पैनिश में ही बात की। लेकिन हमारे मशहूर खिलाड़ी विदेश जाते हैं तो हिंदी या अपनी मातृभाषा में बात करने से कतराते हैं। अपनी भाषा के सम्मान को अपने देश की संस्कृति व स्वाभिमान को कायम रखने का प्रयास कहा जा सकता है। मेसी को देखकर लगा कि वे अपने देश के सच्चे राजदूत हैं।
हां, किसी महान खिलाड़ी के आगमन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। मेसी से फुटबॉल और दूसरे खेलों के दिग्गज खिलाड़ियों का मिलना तो सौहार्द और प्रेरणा देने वाली बात है, पर फिल्मी सितारों और राजनीतिज्ञों का क्या काम था? बहरहाल, भारत के लोकप्रिय क्रिकेट-सितारे महेंद्रसिंह धोनी या विराट कोहली भी मेसी की तरह अपना ‘ब्रांड’ विश्व पटल पर स्थापित कर सकते हैं।
वर्ष के आरम्भ में एनबीए स्टार लेब्रॉन जेम्स और करी ने चीन का एकल दौरा किया था। जेम्स के दौरे को ‘नाइकी’ ने स्पॉन्सर किया था और उसे “द फॉरएवर किंग टूर’ का नाम दिया था। लियोनल मेसी इस कड़ी में और आगे बढ़ गए हैं, जिसमें ब्रांड ‘व्यक्ति’ से भी बड़ा धन बन जाता है। इसीलिए तो उन्हें “ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम (‘गोट’) कहा जाता है।
हमारे खिलाड़ी विदेश जाते हैं तो मातृभाषा में बात करने से कतराते हैं। अपनी भाषा के सम्मान को संस्कृति व स्वाभिमान को कायम रखने का प्रयास कहा जा सकता है। मेसी को देखकर लगा वे स्पैनिश के सच्चे राजदूत हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








