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- Nirjala Ekadashi Fast Significance In Hindi, Rituals About Nirjala Ekadashi In Hindi, Vishnu Puja Vidhi, Bhimseni Ekadashi 2026
15 घंटे पहले
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ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी निर्जला एकादशी 25 जून को है। इसे वर्ष की सबसे बड़ी एकादशियों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन निर्जल व्रत करने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के समान पुण्य मिलता है। घर के मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विशेष शृंगार करें। कई लोग विष्णु सहस्रनाम पाठ, तुलसी पूजन, भजन गायन और रात्रि जागरण भी करते हैं। निर्जला एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहा जाता है।
महाभारत काल में पांडव भीमसेन ने भी यह व्रत किया था। पौराणिक कथा है कि महर्षि वेदव्यास पांडवों को एकादशी व्रत का महत्व बता रहे थे। व्यास जी ने बताया कि एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करके व्रत करना चाहिए। यह सुनकर भीमसेन ने कहा कि वे भूख के कारण वर्ष की सभी एकादशियों का उपवास नहीं कर सकते, क्योंकि उनसे भूख सहन नहीं हो पाती है।
व्यास जी ने भीम को ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जला व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस दिन सूर्योदय से अगले दिन तक जल का भी त्याग करके व्रत करने से साल की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है। एकादशी व्रत के बाद अगले दिन द्वादशी तिथि पर स्नान करके जल, वस्त्र, धन दान करके भोजन करना चाहिए।
भीमसेन ने इस व्रत को स्वीकार किया और श्रद्धा से निर्जला एकादशी का पालन किया। यह व्रत पापों का नाश करने वाला और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कराने वाला माना गया है।

निर्जला एकादशी पर ऐसे कर सकते हैं व्रत
एकादशी तिथि पर सूर्योदय के समय स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें, पूजा में व्रत करने का संकल्प लें। इस व्रत में एकादशी की सुबह से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक भक्त अन्न-जल दोनों का त्याग करते हैं।
सुबह भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने के बाद भगवान के मंत्र ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करते रहें। जितना ज्यादा मंत्र जप कर सकते हैं, उतना करें।
शाम को सूर्यास्त के बाद तुलसी की पूजा करें। भगवान विष्णु की एक बार फिर पूजा करें, इसके बाद शयन करें। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर सुबह जल्दी उठें और पूजा-पाठ, दान-पुण्य करने के बाद भोजन ग्रहण करें। इस तरह यह व्रत पूरा होता है।
स्वास्थ्य कारणों या क्षमता के अनुसार कुछ लोग फलाहार या जल ग्रहण करके भी भगवान की पूजा और श्रद्धा से व्रत करते हैं। जो लोग व्रत नहीं कर पा रहे हैं, वे पूजा-पाठ, दान-पुण्य, मंत्र जप और ग्रंथों का पाठ कर सकते हैं।









