amitabh bachhan birthday javed akhtar reveals mega star success before hit films analysis | ‘सुपरस्टार बनने के बाद भी अमिताभ बच्चन विनम्र रहे: जावेद अख्तर ने बताया – सेट में तय समय से 15 मिनट पहले पहुंचते थे
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amitabh bachhan birthday javed akhtar reveals mega star success before hit films analysis | ‘सुपरस्टार बनने के बाद भी अमिताभ बच्चन विनम्र रहे: जावेद अख्तर ने बताया – सेट में तय समय से 15 मिनट पहले पहुंचते थे

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4 घंटे पहलेलेखक: अमित कर्ण

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बॉलीवुड के इतिहास में कुछ साझेदारियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ फिल्मों को ही नहीं, बल्कि एक पूरे युग को परिभाषित कर देती हैं। ऐसी ही एक अद्वितीय जोड़ी रही सलीम-जावेद की, जिनकी लेखनी ने हिंदी सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ जैसा अमर किरदार दिया। यह किरदार किसी और ने नहीं, बल्कि अमिताभ बच्चन ने पर्दे पर जिया और उन्हें भारतीय सिनेमा का ‘महानायक’ कहा गया।

हाल ही में दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में लेखक जावेद अख्तर उस समय के बार में बताया जब अमिताभ बच्चन को कोई ‘चढ़ता सूरज’ नहीं मानता था।

कामयाबी से पहले की कामयाबी

आमतौर पर फिल्म इंडस्ट्री में यह धारणा रही है कि लोग ‘चढ़ते सूरज’ को ही सलाम करते हैं, यानी सिर्फ सफल अभिनेताओं पर ही दांव लगाते हैं, लेकिन जावेद अख्तर का नजरिया अलग और दूरदर्शी रहा। बकौल जावेद अख्तर, “सूरज में रोशनी देखनी चाहिए, न कि उसके उगने या डूबने के समय पर ध्यान देना चाहिए और यह रोशनी मैंने अमिताभ बच्चन में तब देख ली थी, जब उनकी कई फिल्में, जैसे ‘रास्ते का पत्थर’ और ‘बंसी बिरजू’, बॉक्स ऑफिस पर नाकाम साबित हो रही थीं। इसके बावजूद मुझे अमिताभ बच्चन की काबिलियत पर पूरा यकीन था।

फिल्में भले असफल थीं, मगर एक्टर कतई असफल नहीं थे। मैं यह देख सकता था कि फिल्में नाकाम हैं, पर अमिताभ अपना काम बेहद अच्छा कर रहे हैं। अगर स्क्रिप्ट खराब थी या कहानी में गड़बड़ थी, तो इसका इल्जाम उस अभिनेता पर नहीं लगाया जा सकता। जो काम उसे दिया गया, वह कमाल का कर रहा है।

उनका यह विश्वास सिर्फ सामान्य प्रशंसा पर आधारित नहीं था, बल्कि यह एक लेखक और दर्शक की पैनी समझ थी। जावेद अख्तर के मुताबिक, “चाहे कॉमेडी हो, गंभीर रोल हो, गुस्सा हो या मुस्कान, अमिताभ बच्चन हर भाव को पर्दे पर परफेक्ट तरीके से उतार रहे थे। यह एक नायाब अभिनेता हैं, जिन्हें बस सही स्क्रिप्ट और निर्देशन की जरूरत थी, जिसके बिना फिल्में फ्लॉप हो रही थीं।”

फिल्म ज़ंजीर में अमिताभ बच्चन ने पुलिस अफसर विजय का रोल निभाया था। इस फिल्म में जया भादुड़ी ने भी काम किया था।

फिल्म ज़ंजीर में अमिताभ बच्चन ने पुलिस अफसर विजय का रोल निभाया था। इस फिल्म में जया भादुड़ी ने भी काम किया था।

‘जंजीर’ में रिस्क और दृढ़ विश्वास की जीत

अमिताभ बच्चन के करियर का टर्निंग पॉइंट फिल्म ‘जंजीर’ (1973) थी। यह फिल्म न सिर्फ उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ का तमगा दिलाने में सफल रही, बल्कि सलीम-जावेद को भी बॉलीवुड के सबसे बड़े राइटर्स के तौर पर स्थापित किया। मगर इस फिल्म की कास्टिंग भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी।

जावेद अख्तर बताते हैं, “जंजीर की स्क्रिप्ट कई बड़े अभिनेताओं के पास गई थी, लेकिन सभी ने उसे रिजेक्ट कर दिया। प्रकाश मेहरा साहब (निर्देशक/निर्माता) के पास दो ही विकल्प थे: या तो स्क्रिप्ट छोड़ दें, या उस समय मौजूद ऐसे अभिनेता को लें जिसकी पिछली फिल्में असफल रही थीं। यहीं पर प्रकाश मेहरा साहब के कनविक्शन की जीत हुई। उन्होंने फ्लॉप अभिनेता पर दांव लगाया, मगर अपनी बेहतरीन स्क्रिप्ट नहीं छोड़ी।”

जावेद अख्तर इस बात के लिए प्रकाश मेहरा को सलाम करते हैं, क्योंकि उस वक्त सलीम-जावेद का नाम इतना बड़ा नहीं था कि मेहरा साहब उनकी वजह से यह रिस्क लेते।

वह कहते हैं, “हमारी किस्मत अच्छी थी कि कोई दूसरा अभिनेता ये रोल करने को तैयार नहीं हुआ। यह प्रकाश जी का दृढ़ विश्वास था, मैं इस पर सलाम करता हूँ।”

यह वो क्षण था जब विजय (जंजीर) और दीवार के किरदार को अमिताभ बच्चन ने अपनी आंखों की आग से अमर कर दिया। जावेद अख्तर कहते हैं, “मैंने जो देखा वह था अमिताभ की अभिनय क्षमता, जो यह साबित करती थी कि यही अभिनेता ‘एंग्री यंग मैन’ के नए अवतार को भारत के सामने पेश कर सकता है।”

जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ अमिताभ बच्चन की जंजीर, शान, कुली और शोले जैसी फिल्में लिखी हैं।

जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ अमिताभ बच्चन की जंजीर, शान, कुली और शोले जैसी फिल्में लिखी हैं।

सुपर स्टारडम के बाद भी व्यक्तित्व में कोई बदलाव नहीं आया

जंजीर और दीवार के बाद, जब अमिताभ बच्चन सचमुच सुपरस्टार बन गए, तो उनके व्यक्तित्व में कोई बदलाव नहीं आया। जावेद अख्तर कहते हैं, “व्यवहार और समय की पाबंदी में वे हमेशा नंबर वन थे। पीक पीरियड में भी सुबह 7 बजे की शिफ्ट में 6:45 बजे पहुंच जाते थे। अक्सर सेट पर ताला लगा होता, तो वे गाड़ी में बैठकर इंतजार करते।”

उनकी यह अनुशासन और वफादारी उनके स्टारडम की नींव बनी। यह दिखावा नहीं, बल्कि काम के प्रति उनका समर्पण था।

दोस्ती की डोर: ‘कुली’ हादसा और मानसिक मजबूती

जावेद अख्तर और अमिताभ बच्चन के बीच सिर्फ पेशेवर रिश्ता नहीं था, बल्कि गहरी दोस्ती भी थी। ‘कुली’ (1983) शूटिंग के दौरान हुए जानलेवा हादसे में, अमिताभ जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे, तब जावेद उनके साथ थे। वह याद करते हैं कि बेंगलुरु से मुंबई आते समय अमिताभ की मानसिक दृढ़ता साफ दिखाई दी। उन्होंने कहा, “उनकी मानसिक मजबूती ने साफ दिखाया कि वे कमबैक करेंगे।”

यह सिर्फ अभिनेता के कमबैक की कहानी नहीं थी, बल्कि इंसान के साहस की कहानी थी।

जावेद अख्तर बताते हैं कि वे हफ्ते में दो बार जरूर मिलते थे, कई बार रोज ही बात करते थे। अमिताभ को अनिद्रा की समस्या थी, इसलिए रात भर बैठकर वे बातें करते रहते थे। सुबह होते ही सीधे शूटिंग पर चले जाते। यह समय हिंदी सिनेमा के लिए अनमोल रहा।

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