Annu Kapoor Interview | Struggle Journey Bollywood Uttar Da Puttar
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Annu Kapoor Interview | Struggle Journey Bollywood Uttar Da Puttar

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1 घंटे पहले

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दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर इन दिनों अपनी फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ को लेकर चर्चा में हैं। यह फिल्म एक बेहद संवेदनशील मगर व्यंग्यात्मक तरीके से इंसान के सबसे बड़े असमंजस ‘कर्म बड़ा या किस्मत’ पर सवाल उठाती है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अन्नू कपूर ने अपने अधूरे सपनों, बॉलीवुड के संघर्ष, सोशल मीडिया के अंधविश्वास और जिंदगी के कड़वे अनुभवों पर खुलकर बात की।

अन्नू कपूर ने बताया कि कैसे एक समय उनके पास ड्राइवर को देने के पैसे नहीं थे, लेकिन एक वफादार साथी और उनकी नियति ने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है।

सवाल: ‘उत्तर दा पुत्तर’ सवाल पूछती है, कर्म बड़ा या किस्मत? आप किसे बड़ा मानते हैं?

जवाब: मैं तो यही मानता हूं कि आपके कर्म भी आपकी किस्मत ही तय करती है। भाग्य से बाहर कुछ भी नहीं है। जिस रास्ते पर आपको जाना है और वहां जाकर जो कर्म करने हैं, वह सब पहले से तय (Pre-determined) है। हम तो सिर्फ निमित्त हैं, कोई और है जो हमें चला रहा है। आम आदमी के मन को समझाने के लिए यह कहना अच्छा लगता है कि ‘कर्म ठीक कर तो भाग्य बदल जाएगा’, लेकिन सच यही है कि हमारे एक-एक पल का लेखा-जोखा पहले से एल्गोरिथम की तरह सेट है।

सवाल: अगर किस्मत का पहिया अलग घूमता, तो आज अन्नू कपूर अभिनेता होते या कुछ और?

जवाब: मैं तो आईएएस (IAS) बनना चाहता था। पढ़ाई में रिकॉर्ड अच्छा था, अकादमिक रूप से भी ठीक था। लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि माता-पिता आगे पढ़ा पाते। कोई स्कॉलरशिप देने वाला गॉडफादर भी नहीं था। जब पढ़ाई छूट गई, तो मजबूरी में पिताजी के थिएटर से जुड़ना पड़ा। जैसे कोई काम न मिलने पर बेटा पिता की दुकान पर बैठ जाता है, मेरे साथ भी वही हुआ। आज लोग इसे मेरी अच्छी किस्मत कहते हैं कि मैं एक्टर बना, लेकिन मैं मानता हूं कि मैं जो बनना चाहता था, वो नहीं बन पाया।

सवाल: क्या कभी इस बात को लेकर किस्मत से कोई शिकायत रही?

जवाब: उस उम्र में झटका लगा था, लेकिन वक्त सब सिखा देता है। मेरे बचपन का एक दोस्त था मंटू। वह पढ़ाई में बहुत तेज था, सरस्वती का उपासक था, लेकिन उसके पिता किराने के बड़े व्यापारी थे। पिता ने उसे जबरन अनाज की दुकान पर बिठा दिया। वह जिंदगी भर रोता रहा कि उसका मन कहीं और था, लेकिन उसकी किस्मत में 50 करोड़ के बिजनेस को 400 करोड़ बनाना लिखा था। जिंदगी हमेशा वहां नहीं ले जाती जहां आप जाना चाहते हैं, बल्कि वहां ले जाती है जहां आपको होना चाहिए।

सवाल: आजकल सोशल मीडिया पर किस्मत चमकाने का बड़ा बाजार है। कोई अंगूठी बेच रहा है तो कोई वास्तु। इस अंधविश्वास को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: यह सब इंसानी डर और उम्मीद का कारोबार है। कोई नीलम पहना रहा है, कोई पन्ना। अगर संयोग से कुछ ठीक हो गया, तो लोग पत्थर को चमत्कारी मान लेते हैं। हकीकत यह है कि इन पत्थरों की कोई रीसेल वैल्यू नहीं है। पुराने समय में रोमन में ‘सैलरी’ शब्द नमक (सलेरिआ) से आया था, क्योंकि तब नमक की कीमत थी, सोने की नहीं। कोविड के दौर ने हम सबको सिखा दिया था कि तिजोरी में बंद सोना नहीं, बल्कि मुफ्त में मिलने वाली ऑक्सीजन का एक सिलेंडर सबसे बड़ी दौलत थी। सब वक्त और जरूरत का खेल है।

सवाल: आप एक्टिंग, सिंगिंग, होस्टिंग सब करते हैं। तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ में एक्टिंग और डायरेक्शन एक साथ क्यों नहीं किया? राजनीति में आने के भी ऑफर मिले होंगे?

जवाब: भाई, दोनों चीजें एक साथ संभालना मेरे बस की बात नहीं है। मैं इतना टैलेंटेड नहीं हूं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे राजनीति मेरे बस की बात नहीं है। अच्छा वक्ता होना अलग बात है और देश चलाना बिल्कुल अलग। मैं गरीब हो सकता हूं, लेकिन इतना मूर्ख नहीं कि अपनी सीमाओं को न पहचानूं।

फिल्म के निर्माता संदीप कपूर ने पहले मुझे डायरेक्ट करने को कहा था, लेकिन मैंने मना कर दिया। फिर उन्होंने मुझे यह विरोधाभासी किरदार दिया। फिल्म में मैं एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर का रोल कर रहा हूं जो खुद मेटाफिजिक्स (अंधविश्वास/अध्यात्म) के चक्कर में ऑब्सेस्ड हो जाता है।

सवाल: चार दशकों के करियर में आपने कई उतार-चढ़ाव देखे। जिंदगी का सबसे बड़ा सबक आपको कहां से मिला?

जवाब: मैं किसी को ज्ञान नहीं देता, क्योंकि मैं खुद को अज्ञानी मानता हूं। हां, अनुभव जरूर साझा कर सकता हूं। साल 1985-86 की बात है, मैं जयपुर से कोटा जा रहा था। टोंक के पास एक खेत में गाड़ी रुकवाकर मैंने एक किसान से पानी मांगा। उसने बड़े सम्मान से पीतल के गिलास में ठंडा पानी पिलाया और ताजी गाजर खिलाई। मेरे मुंह से निकला ‘मजा आ गया’।

उस साधारण किसान ने मुझसे एक ऐसी बात कही जो बड़े-बड़े लेखक नहीं लिख सकते। उसने कहा- “कंवर साहब, यो मजो भी घणी टेढ़ी चीज छे। नी आवे तो करोड़ रुपिया में नी आवे, ने आ जावे तो एक गिलास ठंडा पानी में आ जावे।” उस दिन मुझे समझ आया कि असली सुख पैसों में नहीं, संतुष्टि में है। मुझे ‘कबीर’, ‘अंताक्षरी’ और ‘विक्की डोनर’ जैसी फिल्मों में काम करके यही आत्मिक सुकून मिला।

सवाल: आपकी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण या वो दौर कौन सा था जिसने आपको अंदर तक झकझोर दिया?

जवाब: मेरी जर्नी में ऐसे कई मोड़ आए। 4 मई 1992 से एक ऐसा भयानक दौर शुरू हुआ था, जो साढ़े चार महीने तक चला। मैं एक हजार रुपये किराये के छोटे से कमरे में रहता था। जेब में न एक पैसे का कैश था, न कोई चेक, न कोई शूटिंग। मैं दिन भर खाली रहता था, रात को दोस्तों के घर ताश खेलता था और सुबह देर से सोकर उठता था ताकि सीधे लंच कर सकूं और खाना बच जाए।

उस समय मेरे ड्राइवर केशव दत्त ने जो किया, मैं कभी नहीं भूल सकता। जब मैंने तंगी के कारण उससे कहा कि तू कहीं और काम कर ले, मैं तुझे एचएलएल में बड़े अफसर के यहाँ लगवा देता हूं, जहां तुझे 750 की जगह 2000 रुपये सैलरी मिलेगी। तब उस ड्राइवर ने मुझसे कहा था “सर, मैं ब्राह्मण हूं। आपको आपके अच्छे समय पर छोड़ दूंगा, लेकिन बुरे वक्त में छोड़कर गया तो मुझे पाप लगेगा। कोई बात नहीं सर, अगर आप तनख्वाह नहीं दे पा रहे।” ऐसे वफादार लोग किस्मत से मिलते हैं।

सवाल: फिर उस बुरे दौर से आप बाहर कैसे निकले? टर्निंग पॉइंट क्या रहा?

जवाब: साढ़े चार महीने बाद एक शख्स आया और दिल्ली में एक वीडियो फिल्म के लिए मुझे ₹5000 एडवांस दे गया, जिससे थोड़ा सहारा मिला। इसके बाद आया साल 1993। 3 सितंबर 1993 को शुक्रवार के दिन, मैं हमेशा की तरह अपने दोस्त के घर ताश खेल रहा था। रात के 8 बजे टीवी पर एक नया शो शुरू हुआ। मेरे दोस्त की पत्नी ने कहा ‘अरे अन्नू जी, आप टीवी पर दिख रहे हो!’

मैंने मुड़कर देखा, वह ज़ी टीवी पर ‘अंताक्षरी’ का पहला एपिसोड था, जिसे मैंने डेढ़ महीने पहले शूट किया था। मैंने पत्ते हाथ से रख दिए। पूरा शो खत्म होने के बाद मेरे दोस्त ने मुझसे कहा था “पंडित की जुबान है, आज के बाद तुझे जिंदगी में कभी पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।” और नियति ने सचमुच वैसा ही किया।

सवाल: आखिरी सवाल, ‘उत्तर दा पुत्तर’ देखने के बाद दर्शक अपने साथ क्या लेकर जाएंगे?

जवाब: हम कोई उपदेश देने वाली फिल्म नहीं बना रहे हैं। हम दर्शकों के लिए बस एक सवाल छोड़ रहे हैं कि आपकी जिंदगी में जो कुछ भी घट रहा है, वह सिर्फ आपका कर्म है या उसके पीछे कोई छिपी हुई किस्मत भी है? लोग हंसते-हंसते इस कड़वे सच को देखेंगे और सिनेमाघर से बाहर निकलकर थोड़ा ठहरकर सोचेंगे, तो हमारी मेहनत सफल हो जाएगी।



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