कच्ची घाणी। अब तो इसके लिए भी आधुनिक तरीके, मशीनें आ गई हैं। लेकिन पहले कोल्हू होता था और कोल्हू का बैल। जी, हम सब कच्ची घाणी के या कोल्हू के बैल ही तो हैं! कोल्हू चलता था तो ‘चक चूं’ करता था। बैल बस, सारी उम्र चलता रहता था। साल, महीने गिने बिना। गोल-गोल […]
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एन. रघुरामन का कॉलम: वैश्विक मुुद्दों पर बच्चों से कैसे बात करें?
स्कूल बस स्टॉप पर खड़े होकर, फोन स्क्रॉल करते हुए भले ही आप दूसरों को व्यस्त होने का आभास कराएं, लेकिन कान खुले रखिए ताकि सुन सकें कि स्कूल जाने वाले हमारे बच्चे बीते एक हफ्ते से क्या बात कर रहे हैं। सभी नहीं तो कम से कम कुछ बड़े बच्चे तो तीसरे विश्व युद्ध […]






