प्रियदर्शन का कॉलम:  एक युद्ध से निकलकर दूसरे की ओर चली जाती मनुष्यता
टिपण्णी

प्रियदर्शन का कॉलम: एक युद्ध से निकलकर दूसरे की ओर चली जाती मनुष्यता

अपनी कविता ‘युद्ध नायक’ में श्रीकांत वर्मा लिखते हैं- ‘अभी / कल ही की तो बात है / ढाका / एक मांस के लोथड़े की तरह / फेंक दिया गया था / युद्ध कब शुरू हुआ था हिन्द-चीन में? / हृदय में दो करोड़ साठ लाख घाव लिए / वियतनाम / बीसवीं सदी के बीच […]