2 घंटे पहले कॉपी लिंक एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु एक “गरीब स्कूल’ (जिसकी फीस 1960 के दशक में 2 रुपए थी) में पढ़ने के बावजूद मुझे बचपन से ही सख्ती से सिखाया गया था कि अगर मैं किसी साझा या सार्वजनिक जगह पर शोर कर रहा हूं, तो मुझे या तो अपनी आवाज को कम […]
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एन. रघुरामन का कॉलम: स्मॉल टॉक, बड़े परिणाम देती है
अजनबियों से बातचीत कभी हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होती थी, लेकिन टेक्नोलॉजी ने इसे खत्म कर दिया है। अच्छा लगे या नहीं, लेकिन सच यही है। किसी भी सार्वजनिक जगह पर जाइए, हम एक-दूसरे का अभिवादन करने के बजाय आपस में भिड़ते रहते हैं और फिर झगड़े के डर से तुरंत ‘सॉरी’ कह […]






