एन. रघुरामन का कॉलम:  मेंटल स्पेस की जरूरत हो तो लोगों को ‘शशिंग’ से चुप कराने में हर्ज नहीं
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एन. रघुरामन का कॉलम: मेंटल स्पेस की जरूरत हो तो लोगों को ‘शशिंग’ से चुप कराने में हर्ज नहीं

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

एक “गरीब स्कूल’ (जिसकी फीस 1960 के दशक में 2 रुपए थी) में पढ़ने के बावजूद मुझे बचपन से ही सख्ती से सिखाया गया था कि अगर मैं किसी साझा या सार्वजनिक जगह पर शोर कर रहा हूं, तो मुझे या तो अपनी आवाज को कम करना होगा या कहीं और जाना होगा। लेकिन हाल में मैंने देखा कि कुछ स्कूलों में यह अनुशासन सिखाया नहीं जा रहा है।

मुझे दो जगहों पर इस अनुशासन की याद आई। पहली बार, पिछले साल आर्गसी बुक स्टोर की यात्रा के दौरान। यह न्यूयॉर्क सिटी का सबसे पुराना स्वतंत्र पुस्तकालय है, जहां 300 साल पुरानी किताबें भी मौजूद हैं।

सामान्य रिटेल दुकानों के विपरीत, आर्गसी की विशेषज्ञता पुरानी किताबों के संग्रह में है। वहां 1600 और 1700 सदी तक की किताबें मिल जाती हैं। उनके पास प्राचीन नक्शों, प्रिंट्स और ऐतिहासिक हस्ताक्षरों का भी विशाल संग्रह है। दूसरी बार मुझे यह बात एशियाटिक सोसायटी ऑफ मुम्बई की यात्रा के दौरान याद आई।

मैं 11 मार्च को यह खबर पढ़ने के बाद वहां गया था कि उन्होंने 2,000 दुर्लभ और कीमती किताबों को आधिकारिक रूप से “गुमशुदा’ की श्रेणी में सूचीबद्ध किया है। पुस्तक-प्रेमी इस संभावित चोरी या लापरवाही की जांच के लिए पुलिस शिकायत और व्यापक ऑडिट की मांग कर रहे हैं।

इन दोनों जगहों पर स्कूल के बच्चों को अलग-अलग तरीके से सिखाया जा रहा था। जब बच्चों ने शोर किया, तो आर्गसी बुक स्टोर में मौजूद शिक्षक-पर्यवेक्षक या तो आंखों के इशारे से उन्हें सावधान करते, या कंधे पर हाथ रखकर उन्हें चुप रहने को कहते, ताकि दूसरों को परेशानी न हो। जबकि एशियाटिक सोसायटी ऑफ मुम्बई की लाइब्रेरी में शिक्षक बच्चों को अपने हाल पर छोड़कर लाइब्रेरियनों और किताबों के साथ सेल्फी लेने चले गए थे।

मुझे ये घटनाएं इस शुक्रवार की शाम फिर याद आईं, जब एक बहस ने मेरा ध्यान खींचा। एक व्यक्ति जोर-जोर से यह ज्ञान दे रहा था कि उसने मार्च डेडलाइन से पहले ही अपना टारगेट कैसे हासिल कर लिया।

वो इस तरह बोल रहा था, जैसे किसी खचाखच भरे सभागार में प्रस्तुति दे रहा हो और आसपास बैठे लोगों को अपनी बातें स्पष्ट सुनाना चाहता हो। तब एक बुजुर्ग व्यक्ति, जिनके हाथ में एक किताब थी, उसके पास गए और बोले- “एक्सक्यूज मी।’ तेज आवाज में बोलने वाला व्यक्ति रुक गया और बोला- “जी’।

बुजुर्ग ने कहा- “मैं सोच रहा था क्या आप उस किताब के बारे में जानने में रुचि लेंगे, जिसे मैं पढ़ रहा हूं? मैं आपके लिए उसके एक-दो चैप्टर्स पढ़ सकता हूं।’ तेज आवाज में बोलने वाले व्यक्ति ने पहले तो सोचा कि शायद बुजुर्ग सामाजिक रूप से थोड़े असहज हैं, इसलिए उसने धीरे-धीरे जवाब दिया- “जी नहीं, हमें नहीं सुनना कि आप क्या पढ़ रहे हैं, धन्यवाद।’

इतना कहकर वो फिर उस महिला की ओर देखकर मुस्कराया, जिससे वह बात कर रहा था। लेकिन बुजुर्ग व्यक्ति ने हार नहीं मानी और पूछा- “क्या मैं जान सकता हूं क्यों?’ तेज आवाज में बोलने वाले व्यक्ति और महिला ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर उसने थोड़ी कठोर आवाज में कहा- “हम अपने काम में व्यस्त हैं।’ और उसने लैपटॉप पर अपनी नजरें गड़ाकर यह जताया कि उस बुजुर्ग के साथ बातचीत समाप्त हो चुकी है।

और तब, बुजुर्ग ने नहले पर दहला मारा- “तो शायद अब आप समझ सकते हैं कि मैं आपकी सेल्स पर दिए जा रहे ज्ञान को क्यों नहीं सुनना चाहता। यहां पर कुछ लोग अपनी नींद पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं, और कुछ मेरी तरह पढ़ रहे हैं। लेकिन अपनी इच्छा के विरुद्ध मुझे यह सब सुनना पड़ा कि आपने अपना सेल्स टारगेट कैसे हासिल किया।

उम्मीद है आप इसे समझेंगे, धन्यवाद।’ बुजुर्ग व्यक्ति अपनी सीट पर लौट आए। तुरंत ही आसपास के कुछ लोगों की तालियों की आवाज सुनाई दी। उसके बाद पूरे सफर में उन दोनों ने एक शब्द भी नहीं कहा।

शहर में रहते हुए हम अकसर अपने आसपास के लोगों को नजरअंदाज करने की आदत डाल लेते हैं, ताकि प्राइवेसी बनाए रख सकें। लेकिन हमारे इसी अलग-थलग रहने वाले रवैये ने शोर को बढ़ने का अवसर भी दिया है।

फंडा यह है कि तमाम जगहों पर मैनर्स घटते जा रहे हैं, ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम खड़े होकर अपने होठों से “श्श्श’ कहते हुए उन्हें चुप करें। इसे शशिंग (shushing) भी कहते हैं।

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