![]()
ममता बनर्जी की राजनीति की एक खास बात यह है कि वे हमेशा टेढ़ी चाल चलती हैं। इसलिए उनके विरोधियों के लिए उन्हें परास्त करना मुश्किल हो जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे शतरंज के खेल में घोड़ा ढाई घर कूदता है, इसलिए उसकी मार को समझना खिलाड़ियों के लिए दिक्कततलब होता है। जबकि ममता की चाल तो ढाई घर से भी कम या ज्यादा टेढ़ी हो सकती है। यह ममता दीदी ही थीं, जिन्होंने नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का संयोजक नहीं बनने दिया। इसका नतीजा यह निकला कि इस गठजोड़ का सांगठनिक ढांचा आज तक तैयार नहीं हो पाया है। इसी कारण नीतीश भी भाजपा के नेतृत्व वाले गठजोड़ में लौट गए। लेकिन, इसी के साथ ममता लगातार यह दावा भी करती रहीं कि वे इंडिया गठबंधन की स्वाभाविक सदस्य हैं। हालांकि इससे भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर कुछ न कुछ लाभ जरूर हुआ, लेकिन पश्चिम बंगाल के स्तर पर ममता के रुख को भाजपा के प्रति नर्म बताने की कोशिश आज कोई नहीं कर सकता है।
ममता की टेढ़ी चाल का एक अन्य उदाहरण यह है कि उन्होंने बंगाल में अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के उभार को भी अपनी राजनीति के लिए मुफीद बना लिया। जब भाजपा ने ममता पर मुसलमानों के तुष्टीकरण का आरोप लगाकर हिंदुओं की प्रतिक्रियामूलक गोलबंदी के आधार पर बंगाल में बढ़ना शुरू किया तो ममता ने इससे परेशान होने के बजाय उसमें अपने लिए मौका देखा। भाजपा के बढ़ने का मतलब उनके लिए राज्य के पुराने दलों माकपा और कांग्रेस के प्रभाव का सिकुड़ना भी था। बस उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि उनकी अपनी पार्टी के प्रभाव में कटौती न हो। उन्होंने यही किया। तृणमूल कांग्रेस की शक्ति में क्षय नहीं हुआ। कांग्रेस और माकपा की ताकत का एक बड़ा हिस्सा तृणमूल में पहले ही जा चुका था। बचा हुआ हिस्सा भाजपा में समा गया और ये दोनों पार्टियां तकरीबन सिफर हो गईं। भाजपा के उभार से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक शक्तियों का संतुलन बदलकर एक तरह से दो पार्टियों की प्रतियोगिता का हो गया। यह ममता के अनुकूल साबित हुआ। क्योंकि कांग्रेस और माकपा उनके सामने हमेशा मुसलमानों के वोटों को बांटने की समस्या पेश करती थीं। जैसे ही ममता विरोधी दायरे में भाजपा हावी हुई, ममता को 27 फीसदी मुसलमान वोटर अपने गारंटीशुदा समर्थकों के रूप में मिल गए। यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक पूंजी थी, और है। आज यह बात कही जा सकती है कि बंगाल में भाजपा के आगे बढ़ने से ममता की सत्ता पर पकड़ पहले से और मजबूत हुई है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन ने उसमें यह विश्वास पैदा कर दिया था कि वह प्रचार-तंत्र और संसाधनों के दम पर ममता को विचलित कर सकती है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उसने एक जबरदस्त राजनीतिक माहौल पैदा करके तृणमूल को हराना चाहा। लेकिन भाजपा की जीत की भविष्यवाणियां करने वाले उसके समर्थक यह देख पाने में विफल रहे कि प्रदेश स्तर पर तृणमूल कांग्रेस का संगठन भाजपा की तुलना में बहुत बड़ा है। मोटे तौर पर बंगाल में करीब सत्तर हजार बूथ माने जा सकते हैं। केवल तृणमूल ही ऐसा संगठन है, जिसके पास पूरे प्रदेश में हर बूथ पर तैनात करने के लिए प्रतिबद्ध, सक्षम और अनुभवी कार्यकर्ता हैं। बंगाल में भाजपा की सांगठनिक हैसियत इतनी नहीं है। यही अंतर बूथ स्तर के एजेंटों (बीएलए) की संख्या में भी देखा जा सकता है। यह एसआईआर की प्रक्रिया से प्रमाणित हो गया है। कटे हुए वोटरों के नाम जुड़वाने के लिए लगाए गए शिविरों में जहां भाजपा के इक्का-दुक्का बीएलए सक्रिय देखे गए, वहीं उस पूरी प्रक्रिया को तृणमूल के बीएलए कटिबद्धता के साथ नियंत्रित करते देखे गए हैं। बंगाल में राजनीतिक शक्तियों का संतुलन बदलकर दो पार्टियों की प्रतियोगिता का हो गया है। यह ममता के अनुकूल है। क्योंकि कांग्रेस और माकपा उनके सामने मुसलमानों के वोट बांटने की समस्या पेश करती थी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link








