इंस्पायरिंग:  केवल करने के लिए कोई काम न करें, मैदान में आएं तो जीत कर जाएं – पीवी सिंधू
अअनुबंधित

इंस्पायरिंग: केवल करने के लिए कोई काम न करें, मैदान में आएं तो जीत कर जाएं – पीवी सिंधू

Spread the love


4 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

भारतीय बैडमिंटन प्लेयर सिंधू ने हाल ही में जापान ओपन टाइटल जीता। मुश्किल दौर की कहानी, उन्हीं की जुबानी… मुझे लगता है हर मेडल के पीछे ऐसी कहानी होती है, जो दुनिया को दिखाई नहीं देती। लोग सिर्फ पोडियम पर खड़े खिलाड़ी को देखते हैं, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए कितने आंसू, कितनी तकलीफ, कितना सब्र और कितनी मेहनत लगी… यह कम ही जानते हैं। पिछले कुछ साल मेरे लिए आसान नहीं थे। मुझे बार-बार चोट लगी। छोटी चोटें खिलाड़ी की जिंदगी में बड़ा असर पैदा करती हैं। शरीर में दर्द होता है, लेकिन उससे अधिक तकलीफ दिल और दिमाग में होती है। कई दिन ऐसे भी आए जब मैं मायूस होती थी। मन में कई सवाल उठते थे। क्या मैं पहले जैसी वापसी कर पाऊंगी? क्या शरीर फिर साथ देगा? क्या सौ फीसदी मेहनत कर पाऊंगी? क्या फिर दुनिया के सबसे बड़े मंच पर जीत हासिल कर पाऊंगी? एक खिलाड़ी के मन में ऐसे सवाल आना आम है। चोट केवल शरीर को नहीं, भरोसे को भी घायल करती है। कई बार आप बाहर से मुस्कराते हैं, लेकिन अंदर से टूट रहे होते हैं। लेकिन मैंने एक बात कभी नहीं छोड़ी…अपने ऊपर यकीन। लोग बहुत कुछ कहते हैं। कोई कहता है अब पहले जैसी बात नहीं। कोई कहता है वापसी मुश्किल है। लेकिन मैंने कभी किसी को जवाब देने की कोशिश नहीं की। मैंने हमेशा अपने खेल को ही जवाब बनाने की ठानी। मुझे यकीन था कि ईमानदारी से मेहनत करती रहूंगी, तो एक दिन मेहनत जरूर रंग लाएगी। जब मैं चोट से उबर रही थी, तब जल्दबाजी नहीं की। मैं जानती थी कि अगर मैं आधी फिटनेस के साथ कोर्ट पर लौटूंगी, तो पहले ही मैच हार जाऊंगी। मुझे सिर्फ खेलने के लिए नहीं लौटना था। मुझे अपनी पूरी ताकत के साथ लौटना था…इसलिए सब्र किया। हर दिन को नए मौके की तरह लिया। कभी आराम किया, कभी रिकवरी की, कभी शरीर को मजबूत बनाया। धीरे-धीरे मैं फिर से अपने पुराने रंग में लौटने लगी। उस सफर में मैं अकेली नहीं थी। मेरे कोच, पूरी सपोर्ट टीम और मेरे अपने लोग हर वक्त साथ खड़े रहे। जब मेरा हौसला कम होता था, तब वही लोग कहते थे, ‘सब ठीक होगा… तुम पहले से अधिक मजबूत होकर लौटोगी।’ उनके अल्फाज मेरे लिए बड़ी ताकत बने। मैंने केवल फिट होने पर ध्यान नहीं दिया। अपने खेल को भी नए सिरे से समझा। अपनी हर गलती को पहचाना। यह देखा कि कहां कमी है। फिर अपने कोच के साथ बैठकर हर छोटी-बड़ी बात पर काम किया। फिटनेस, रफ्तार, कोर्ट पर मूवमेंट, हर पहलू को बेहतर बनाने की कोशिश की। मकसद सिर्फ जीतना नहीं, गलतियां न दोहराना था। जापान ओपन के फाइनल में जब आखिरी अंक मिला, तब मुझे कुछ पल यकीन नहीं हुआ कि मैं जीत चुकी हूं। मैं तब तक खुशी नहीं मना रही थी, जब तक शटल जमीन पर नहीं गिरी और अंपायर ने जीत का ऐलान नहीं किया। मेरी आंखों में आंसू थे। यह उन तमाम मुश्किल दिनों का जवाब था। उन सुबहों का जवाब था, जब दर्द के बावजूद मैंने अभ्यास किया। उन रातों का जवाब था, जब मैं खुद से लड़ रही थी। उन तमाम लोगों के भरोसे का जवाब था, जिन्होंने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा। जिंदगी का फैसला मुश्किल वक्त को न करने दें अगर आप खुद पर भरोसा नहीं छोड़ते, हर दिन थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करते हैं, गिरकर उठना जानते हैं, तो मंजिल दूर++ नहीं है। अपनी कहानी का फैसला मुश्किल वक्त को न करने दें। हमेशा याद रखें, हालात बदलते हैं। (तमाम इंटरव्यू में…)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *