एन. रघुरामन का कॉलम:  भाषा क्लास के अंदर कम और बाहर ज्यादा सीखी जाती है
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एन. रघुरामन का कॉलम: भाषा क्लास के अंदर कम और बाहर ज्यादा सीखी जाती है

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53 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मिस्टर ‘एम’ काम करने के लिए टी-स्टॉल पर गए और मिस्टर ‘क्यू’ अपनी कमाई छोड़कर ईवनिंग क्लास में गए। वे दोनों एक ही मकसद के लिए गए थे। दो महीने बाद मिस्टर ‘एम’ मराठी भाषा में पारंगत हो गए, जबकि मिस्टर ‘क्यू’ अब भी उनकी तरह धाराप्रवाह बोलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

उन्होंने दुनिया को दोष देना भी शुरू कर दिया कि ‘अगर कोई मुझसे बात ही नहीं करेगा, तो आप मुझसे नई भाषा सीख पाने की उम्मीद कैसे करते हैं?’ महाराष्ट्र सरकार ने सभी प्रवासी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए अनिवार्य किया है कि वे 15 अगस्त 2026 तक मराठी भाषा का कम से कम कामचलाऊ ज्ञान साबित करें नहीं तो उनका परमिट रद्द हो जाएगा। इसके बाद मराठी सीखने की होड़ मच गई है। मिस्टर ‘एम’ की तरह कई तो सफल हो गए, जबकि कुछ अब भी बड़बड़ा रहे हैं कि ‘ये क्या नई मुसीबत है।’

मिस्टर ‘एम’ झारखंड से और मिस्टर ‘क्यू’ उत्तर प्रदेश से हैं। दोनों ने तय समय सीमा में नया कौशल सीखने और एक ही लक्ष्य पाने के लिए अलग-अलग रास्ते चुने। मिस्टर ‘एम’ ने अपना रिक्शा एक स्थानीय परमिट धारक को किराए पर दे दिया, जिसके पास खुद का रिक्शा नहीं था और किराया कमाने लगे।

चूंकि वे ड्राइविंग की जिम्मेदारी से मुक्त थे तो उन्होंने मराठी-भाषी आबादी की बहुतायत वाले मुंबई के परेल रेलवे स्टेशन के पास एक व्यस्त टी-स्टॉल में वेटर की नौकरी कर ली। समुदाय के बीच घुल-मिल कर मिस्टर ‘एम’ ने तेजी से मराठी सीख ली। फूल विक्रेता महिलाओं, दूसरी-तीसरी पीढ़ी के खुदरा दुकानदारों और पुराने टैक्सी चालकों को चाय-स्नैक्स परोसते हुए उन्होंने मिस्टर ‘क्यू’ से कहीं तेजी से मराठी सीख ली। अब तीसरा महीना है और वे उसी टी-स्टॉल में शिफ्टों में काम करते हैं और कम से कम आधा दिन अपना ऑटो भी चलाते हैं।

जब प्रवासी चालक समुदाय के अधिकतर लोग नई भाषा सीखने के लिए अब भी कक्षाओं, यूट्यूब लेसन्स, मराठी रील्स के स्क्रीनशॉट और मराठी अखबारों में उलझे हैं, मिस्टर ‘एम’ ने साबित कर दिया कि धीमी पढ़ाई की तुलना में असल दुनिया की सक्रिय बातचीत बेहतर होती है। इधर, मिस्टर ‘क्यू’ जैसे लोगों को थकाऊ कामकाजी घंटों के बीच लैंग्वेज क्लास का समय निकालने के लिए बड़ी लॉजिस्टिकल और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है।

सोमवार सुबह जब मैंने कुछ दूरी के लिए ऑटो लिया, तो मिस्टर ‘क्यू’ ने दुखी स्वर में कहा कि ज्यादातर यात्री डेस्टिनेशन के अलावा और कुछ नहीं बोलते। वे बोले, ‘अधिकतर लोग ईयर प्लग लगाकर मोबाइल में खोए रहते हैं। अगर बोल भी रहे होते हैं तो अंग्रेजी या हिंदी में, या अपने परिजनों से मातृभाषा में बात करते हैं। उतरते वक्त सिर्फ इतना पूछते हैं- कितना हुआ? पैसे देकर फोन पर बतियाते हुए ही चले जाते हैं।’ उन्होंने पूछा कि ‘अब बताइए कोई कैसे हम ड्राइवरों से नई भाषा सीखने की उम्मीद कर सकता है?’

इससे मुझे स्कूल की अपनी फ्रेंच टीचर याद आ गईं, जो स्टूडेंट्स से जब भी मिलतीं, फ्रेंच में ही बात करती थीं। स्कूल की लॉबी में ही नहीं, बाजार में भी। ‘मैं कहां जा रहा हूं’, ‘यह जगह कहां है’ या ‘यह रेस्तरां कहां है’ जैसी साधारण बातचीत भी तब मेरे खूब काम आई, जब मैंने एम्प्लॉयी एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत पेरिस में फ्रांस के सबसे लोकप्रिय अखबार ‘Le Monde’ में कुछ हफ्ते काम किया था।

अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए नई भाषा सीख रहे इन ड्राइवरों से मैंने सीखा कि यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमसे ज्यादा तेजी से नई भाषाएं सीखें तो कोई ऐसा जरूर होना चाहिए, जो उनसे उस भाषा में बातचीत करे। यह बातचीत सैद्धांतिक या अकादमिक स्तर की नहीं, बल्कि उन शब्दों और वाक्यों के इर्द-गिर्द होनी चाहिए, जो रोजमर्रा में इस्तेमाल होते हैं।

फंडा यह है कि भाषा को गलियों-सड़कों पर अधिक बेहतर सीखा जा सकता है, बजाय उन बंद कक्षाओं के, जहां वह सिर्फ शब्दकोश के अर्थों के इर्द-गिर्द घूमती है।

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