कामयाबी का फॉर्मूला नहीं, हुनर को क्राफ्ट में बदलें:  प्रतिभा, अनुशासन और आत्म सम्मान… ये तीन चीजें आपकी क्षमता को सफलता में बदलती हैं
टिपण्णी

कामयाबी का फॉर्मूला नहीं, हुनर को क्राफ्ट में बदलें: प्रतिभा, अनुशासन और आत्म सम्मान… ये तीन चीजें आपकी क्षमता को सफलता में बदलती हैं

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Javed Akhtar, Turn Your Skills Into Craft, Not A Formula For Success

जावेद अख्तर (मशहूर गीतकार और लेखक). मुंबई1 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
जावेद कहते हैं-  टैलेंट को उपलब्धि में बदलने के लिए कड़ी मेहनत, सब्र और सेल्फ-डिसिप्लिन की जरूरत होती है।      -   फाइल फोटो - Dainik Bhaskar

जावेद कहते हैं- टैलेंट को उपलब्धि में बदलने के लिए कड़ी मेहनत, सब्र और सेल्फ-डिसिप्लिन की जरूरत होती है। – फाइल फोटो

कामयाबी का कोई एक फॉर्मूला नहीं होता। अगर ऐसा कोई फॉर्मूला होता, तो शायद दुनिया में नाकामयाबी नाम की चीज ही नहीं होती। फिर भी कुछ बातें हैं, जो लगभग हर कामयाब इंसान की जिंदगी में किसी-न-किसी रूप में दिखाई देती हैं। मेरे अनुभव में कामयाबी के लिए तीन चीजें बेहद महत्वपूर्ण हैं- प्रतिभा, अनुशासन और आत्म-सम्मान। इन तीनों में से किसी एक की भी कमी इंसान को उसकी पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोक सकती है।

सबसे पहले प्रतिभा की बात करते हैं। टैलेंट एक ऐसी पूंजी है, जो हमें जन्म के साथ मिलती है। कोई शब्दों का जादूगर बनकर पैदा होता है, कोई म्यूजिक की समझ लेकर, कोई मैथ्स को लेकर कुदरती हुनर के साथ और कोई लोगों के मन को पढ़ लेने की अद्भुत क्षमता के साथ। लेकिन टैलेंट अपने-आप में कामयाबी की गारंटी नहीं है। टैलेंट शुरुआती फायदा देता है, लेकिन आगे वही टिकता है जो अपने हुनर को क्राफ्ट में बदल देता है। दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है, जिनमें बेमिसाल टैलेंट था, लेकिन उनकी उपलब्धियां उनकी काबिलियत से बहुत छोटी रहीं।

बीज चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे सही मिट्टी, पानी और देखभाल न मिले तो वह पेड़ नहीं बन सकता। इसी तरह टैलेंट को उपलब्धि में बदलने के लिए कड़ी मेहनत, सब्र और सेल्फ-डिसिप्लिन की जरूरत होती है। लेकिन यहां मुझे अपने बारे में एक सच्चाई स्वीकार करनी होगी। जब लोग कामयाबी और अनुशासन की बात करते हैं, तो वे अक्सर मान लेते हैं कि कामयाब इंसान हर दिन एक तयशुदा समय पर उठता होगा, हर काम वक्त पर करता होगा और कभी टाल-मटोल नहीं करता होगा। लेकिन मेरे मामले में यह तस्वीर पूरी तरह सही नहीं है। मैं उन लोगों में से हूं, जो अकसर काम को आखिरी वक्त तक टालते रहते हैं।

मान लीजिए किसी ने कहा कि कोई गाना पांच तारीख तक देना है। मेरे भीतर से तुरंत एक आवाज आती है- अरे, अभी तो दो तारीख है। अभी बहुत वक्त है। फिर दो तारीख तीन में बदल जाती है, तीन चार में, और देखते-देखते पांच तारीख सामने खड़ी हो जाती है। तब अचानक एक अजीब-सा बदलाव होता है। जो काम कई दिनों से शुरू नहीं हो पा रहा था, वही कुछ घंटों में आगे बढ़ने लगता है। दिमाग तेजी से काम करने लगता है। विचार आने लगते हैं। शब्द मिलने लगते हैं। जैसे भीतर कहीं कोई मशीन थी, जो अब तक बंद पड़ी थी और अचानक पूरी रफ्तार से चलने लगी हो।

कई बार मुझे लगता है कि मेरी प्रेरणा का स्रोत उत्साह और जोश से ज्यादा डर है, घबराहट है। मैं मूड बनने का इंतजार कम करता हूं, डेडलाइन के दबाव का इंतजार ज्यादा करता हूं। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन बहुत-से रचनात्मक लोगों के साथ ऐसा होता है।

दरअसल डेडलाइन की अपनी एक साइकोलॉजी होती है। जब समय बहुत होता है तो हमारा मन यह मानकर चलता है कि काम कभी भी किया जा सकता है। लेकिन जैसे-जैसे वक्त करीब आने लगता है, हमारे भीतर एक बेचैनी पैदा होती है। यही बेचैनी एनर्जी में बदल जाती है। यही एनर्जी हमें काम की ओर धकेलती है। मैं इसे डेडलाइन का आतंक कहता हूं। यह आतंक नुकसानदेह नहीं होता। यह वह डर नहीं है जो हमें जकड़ दे। यह वह डर है जो हमें जगाता है। यह हमें याद दिलाता है कि अब टालने की गुंजाइश नहीं बची। अब करना ही होगा।

मुझे याद है, ‘तुमको देखा तो ये खयाल आया’ जैसे गीत को मैं कई दिनों तक टालता रहा। गीत लिखना था, लेकिन मैं उसे कल पर छोड़ता जा रहा था। फिर वह वक्त आ गया, जब डेडलाइन बिल्कुल सिर पर खड़ी थी। तब मैंने बैठकर उसे लिखना शुरू किया और हैरत की बात यह है कि पूरा गीत महज नौ मिनट में लिख गया। इससे मुझे एक बार फिर एहसास हुआ कि कई बार हम प्रेरणा का इंतजार करते रहते हैं, जबकि असली जरूरत काम पर बैठ जाने की होती है। जब आप काम शुरू कर देते हैं, तो शब्द अकसर खुद अपना रास्ता बना लेते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ यह आदत सुधरने के बजाय कई बार और मजबूत हो जाती है। मैं यह नहीं कहूंगा कि यह काम करने का बेहतर तरीका है। शायद यह मेरी कमजोरी है। लेकिन सच यह भी है कि इसी कामकाजी तौर-तरीके ने मुझे कई बार मेरी सीमाओं से आगे जाकर काम करने की क्षमता दी है। इसलिए मैं इसे अपनी कमजोरी और ताकत- दोनों मानता हूं।

लेकिन कामयाबी की कहानी केवल टैलेंट और अनुशासन पर समाप्त नहीं होती। एक तीसरी चीज है, जिसके बिना कामयाबी का अर्थ अधूरा रह जाता है। वह है आत्म-सम्मान, खुद्दारी। इसे लोग अकसर अहंकार और घमंड समझ लेते हैं, जबकि दोनों में बहुत फर्क है। अहंकार आपको दूसरों से बड़ा साबित करना चाहता है, जबकि आत्म-सम्मान आपको अपने भीतर की गरिमा का एहसास कराता है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप खुद को सबसे बड़ा, सबसे बेहतर समझें। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आप अपनी वैल्यू पहचानें और अपनी गरिमा तथा सिद्धांतों से समझौता न करें।

जिंदगी में बार-बार ऐसे हालात बनते हैं, जब इंसान को आराम और इज्जत में से किसी एक को चुनना पड़ता है। एक रास्ता आसान होता है। उसके लिए थोड़ा समझौता करना पड़ता है, थोड़ा सिर झुकाना पड़ता है और अपने कुछ उसूलों को किनारे रखना पड़ता है। बदले में फायदा मिलता है, मौके मिलते हैं और तरक्की का रास्ता खुलता हुआ नजर आता है, कभी-कभी कामयाबी भी मिल जाती है। लेकिन सवाल यह है कि उस कामयाबी की कीमत क्या है?

हर किसी को अपने जीवन में एक अदृश्य लक्ष्मण-रेखा निर्धारित करनी पड़ती है। वही तय करती है कि वह किन परिस्थितियों में झुक सकता है और किनके सामने नहीं। यह रेखा किसी कागज या जमीन पर नहीं, बल्कि मन और विवेक के भीतर खिंची होती है। आपमें यह कहने का साहस होना चाहिए कि मैं यहां तक जा सकता हूं, लेकिन इसके आगे नहीं। इसलिए सेल्फ-रेस्पेक्ट सिर्फ एक जज्बा नहीं, बल्कि दुनिया के सामने अपनी अहमियत और अपनी हदों का ऐलान भी है। लेकिन इसका मतलब जिद भी नहीं है; यह समझना बहुत जरूरी है।

टैलेंट आपको शुरुआत करने की ताकत देता है। अनुशासन आपको रास्ते पर बनाए रखता है। लेकिन आत्म-सम्मान आपको यह याद दिलाता रहता है कि मंजिल तक पहुंचने की दौड़ में आपने अपने भीतर के इंसान को कितना बचाकर रखा है। मैंने अपनी जिंदगी में यह देखा है कि रचनाकार का सबसे बड़ा निवेश उसका दिमाग और उसकी कल्पना होती है। एक गीतकार या लेखक अपनी रचना लिख देता है, लेकिन कई बार उसके बाद उस रचना से होने वाले लाभ में उसका कोई हिस्सा नहीं होता। मुझे यह हमेशा गलत लगा।

जब मैंने गीतकारों और लेखकों के अधिकारों की बात उठानी शुरू की, तो बहुत लोगों ने कहा कि यह लड़ाई मुश्किल है, व्यवस्था ऐसी ही चलती आई है। कुछ लोगों ने सलाह दी कि मुझे अपने काम से काम रखना चाहिए। लेकिन मेरे लिए यह सिर्फ पैसों का मामला नहीं था। यह आत्म-सम्मान का मामला था। मेरा मानना था कि अगर किसी इमारत की नींव लेखक और संगीतकार रखते हैं, तो उन्हें यह अधिकार भी मिलना चाहिए कि उनकी रचना का इस्तेमाल जहां-जहां हो, वहां उनके अधिकार को मान्यता मिले।

मैंने इस मुद्दे पर वर्षों तक आवाज उठाई, बैठकों में गया, बहसें कीं, लोगों को समझाने की कोशिश की। आखिरकार जब कॉपीराइट एक्ट में बदलाव हुए और लेखकों तथा गीतकारों के अधिकारों को अधिक मान्यता मिली, तो मुझे खुशी इसलिए नहीं हुई कि कोई व्यक्तिगत जीत मिली थी। संतोष इस बात का था कि रचनाकार की गरिमा को कुछ हद तक स्वीकार किया गया। मेरे लिए यह हमेशा आत्म-सम्मान की लड़ाई थी, और आत्म-सम्मान की लड़ाई कभी छोटी नहीं होती।

(संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *