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दुबई में रहने वाले सुमेश पलक्की वीदु और उनकी पत्नी आथिरा सुरेंद्रन नायर ने पय्यानूर में ऐसा ‘हॉलिडे होम’ बनाया है, जो लग्जरी विला से ज्यादा एक ‘सांस्कृतिक धरोहर’ जैसा एहसास देता है। यह घर उत्तर केरल की अनुष्ठानिक कला ‘थेय्यम’ के प्रति उनकी श्रद्धा का प्रतीक है। 3 हजार वर्ग फुट में फैले इस आशियाने को स्थानीय मंदिर शिल्प व ‘वास्तु शास्त्र’ के सिद्धांतों पर गढ़ा गया है। यह रुझान केरल तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेश में बसे भारतीय अब जड़ों की ओर लौट रहे हैं। अमेरिका में रहने वाले मलयाली परिवार ने कोझिकोड में ‘द लेटरिटे कर्व’ में कंक्रीट को नकार कर पुराने पुश्तैनी घरों (थरावाडु) से बचाई गई लकड़ियों व खंभों का इस्तेमाल किया है। यहां पारंपरिक ‘नल्लुकेट्टू’ शैली का आंगन बच्चों को टेक वर्ल्ड से निकाल कर मिट्टी व बारिश का अहसास कराता है। ऐसा ही सांस्कृतिक अनुराग सिंगापुर में बसे तमिल परिवार के ‘द एंसेस्ट्रल रिट्रीट’ में झलकता है। मदुरै के पास बना यह घर बाहर से चेट्टीनाड महल जैसा है, जिसमें हाथ से बनी पारंपरिक ‘अतंगुड़ी’ टाइल्स व मंदिर शैली के नक्काशीदार दरवाजों का वैभव है। हालांकि भीतर से यह पूरी तरह स्मार्ट होम है, लेकिन इसका विशाल पारंपरिक दालान आज भी सामाजिक जुड़ाव का केंद्र बना हुआ है। मानसिक सुकून विरासत में ही न्यूयॉर्क की मनोवैज्ञानिक डॉ. शेफाली सबारी कहती हैं, जब इंसान आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी जड़ों को खो देता है, तो वह भीतर से एक खालीपन महसूस करने लगता है। एनआरआई परिवारों का अपनी मिट्टी के पत्थरों (लैटेराइट) या पारंपरिक शिल्प (थेय्यम) की ओर लौटना दरअसल उस ‘आंतरिक रिक्तता’ को भरने की कोशिश है। एनआरआई परिवारों में जड़ों की ओर लौटने का यह रुझान ‘सांस्कृतिक नॉस्टेल्जिया’ और ‘पहचान के संकट’ का एक सकारात्मक समाधान है। सात समंदर पार की भौतिक सुख-सुविधाएं शारीरिक आराम तो दे सकती हैं, लेकिन मानसिक सुकून के लिए इंसान अपनी विरासत की ओर ही देखता है। महाबलीपुरम से मंगाई कृष्ण की प्रतिमा
परंपरा की झलक समेटे इस घर का लेआउट ‘एच’ आकार का है। इसमें महाबलीपुरम की ग्रेनाइट कृष्ण प्रतिमा और उत्तर भारतीय मंदिरों के प्राचीन लकड़ी के स्तंभ आध्यात्मिक भव्यता जोड़ते हैं। लिविंग रूम में स्थित ‘विलक्कू’ के आकार की विशाल मूर्तियां सुमेश और आथिरा की बचपन की यादों और सांस्कृतिक जड़ों को जीवंत करती हैं।
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