नवनीत गुर्जर का कॉलम:  कॉमेडी ऐसी हो जो हंसाए भी, सोचने पर मजबूर करे और मर्यादा का सम्मान भी करे
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नवनीत गुर्जर का कॉलम: कॉमेडी ऐसी हो जो हंसाए भी, सोचने पर मजबूर करे और मर्यादा का सम्मान भी करे

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6 घंटे पहले

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नवनीत गुर्जर - Dainik Bhaskar

नवनीत गुर्जर

स्टैंडअप कॉमेडी किसी भी लोकतांत्रिक समाज की एक स्वस्थ परम्परा हो सकती है, लेकिन जब हास्य की जगह फूहड़ता, अपमान और सस्ती लोकप्रियता ले लेती है, तब वह कला नहीं बेवजह का शोर बन जाती है। समाज को ऐसी कॉमेडी चाहिए जो हंसाए भी, सोचने पर मजबूर भी करे और मर्यादा की सीमाओं का सम्मान भी करे। लोकप्रियता का आधार प्रतिभा या कला होना चाहिए। विवाद नहीं।

पिछले कुछ वर्षों में स्टैंडअप कॉमेडी का तेजी से विस्तार हुआ है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्मों ने अनेक कॉमेडियनों को आसमान पर पहुंचा दिया है। इनमें कई कलाकार सामाजिक विसंगतियों, राजनीति और रोजमर्रा की समस्याओं पर सार्थक व्यंग्य करते हैं। लेकिन इन कॉमेडियनों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो लोकप्रियता पाने के लिए अश्लील भाषा, धार्मिक या सामाजिक संवेदनाओं पर चोट करने वाले मजाक और विवादास्पद टिप्पणियों का सहारा लेता है।

हाल के दिनों में कुछ स्टैंडअप कलाकारों के खिलाफ मुकदमे भी हुए और कानूनी कार्रवाई भी। कुछ को तो जेल तक जाना पड़ा, लेकिन यह भी उनके लिए फायदेमंद ही साबित हुआ। वे जेल से लौटकर और भी पॉपुलर हो गए। वे अपना वही फूहड़ अलाप जारी रखे हुए हैं और हमारे युवा हो-हो करके उनका उत्साह बढ़ाते रहते हैं।

दरअसल, समस्या यह है कि आज विवाद स्वयं एक बड़ा मार्केटिंग टूल बन गया है। कलाकार विवादित टिप्पणी करता है। उसका वीडियो वायरल होता है और वह पहले से ज्यादा पॉपुलर हो जाता है। ऐसे में कुछ लोगों को लगता है कि लोकप्रियता के लिए मर्यादा और जिम्मेदारी की जरूरत ही नहीं है।

केवल गाली-गलौज और फूहड़ता परोसकर पॉपुलर होने वाले कोई भी लोग आज के युवा को बरगलाने के लिए सबसे मुफीद हथियार साबित हो रहे हैं। हर कोई जानता है कि किसी भी अस्त्र या शस्त्र से ज्यादा घायल करने वाला कोई है तो वह है आपकी जुबान, आपकी भाषा या उसकी शैली।

ईश्वर ने आपको जुबान दी है, इसका मतलब ये कतई नहीं है कि जब चाहो और जहां चाहो, उठाई जीभ और तालव्य से लगा दी। चाहे उससे जो भी अमर्यादित शब्द या वाक्य या बोल फूटें, जो सामने वाले को घायल, गंभीर घायल करने के लिए काफी हो सकते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि फूहड़ता या अश्लील बोलों के खिलाफ कोई सख्त कानून ही नहीं है। शिकायत होती है, व्यक्ति को सजा होती है और वो तुरंत छूट भी जाता है। फूहड़ कॉमेडी इसीलिए चलती जा रही है। लोग सुन भी रहे हैं। सराह भी रहे हैं। दर्शकों, श्रोताओं की जिम्मेदारी सबसे बड़ी है। जिस तरह की सामग्री को लोग देखते और साझा करते हैं, बाजार में या लोगों के सामने वैसी ही सामग्री ज्यादा आने लगती है।

यदि हमारा समाज स्तरहीन हास्य को बढ़ावा देगा तो वैसा ही हास्य ज्यादा मात्रा में हमारे सामने आएगा। देश में हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी और शरद जोशी जैसे महान व्यंग्यकार हुए, लेकिन उन्होंने कभी अपनी भाषा या व्यंग्य में फूहड़ता नहीं आने दी। हमेशा अश्लीलता के बिना समाज को आईना दिखाते रहे।

शरद जोशी के कई प्रसिद्ध लेख हैं, जो समाज और सरकार पर करारा व्यंग्य करते हैं। आज भी व्यवस्था के खिलाफ मौजू हैं। उनका एक लेख है- चोरी का कुआं, खोदो तो मिले।

कहानी कुछ इस तरह है कि एक गांव में पीने के पानी की खातिर कुएं की जरूरत थी। गांव वालों ने पड़ताल की तो पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में तो उस गांव में कुआं है! अब करें तो क्या करें? गांव में एक होशियार बुजुर्ग ने लोगों को सलाह दी कि कुआं चोरी होने की थाने में रपट लिखाओ।

गांव वालों को बात समझ में तो नहीं आई लेकिन बुजुर्ग का मान रखने के लिए रपट लिखा दी। रपट लिखाते ही पुलिस चोरी की जांच करने गांव में आई। गांव वालों ने सरकारी रिकॉर्ड दिखाया कि साहब कुआं तो था लेकिन चोरी हो गया।

पुलिस ने पूछा- कहां था कुआं? उस होशियार बुजुर्ग ने एक जगह बताई- साहब यहीं था कुआं। चोरों ने हो सकता है उसे यहीं गाड़ दिया हो!

पुलिस ने वहां खुदाई की। गहरी खुदाई करने पर पानी निकल आया। …और गांव वालों को कुआं मिल गया!

अब व्यवस्था पर इससे बड़ा व्यंग्य क्या हो सकता है भला?

विवादों का अपने आप में एक मार्केटिंग टूल बन जाना… समस्या यह है कि आज विवाद स्वयं मार्केटिंग टूल बन गया है। कलाकार विवादित टिप्पणी करता है। उसका वीडियो वायरल होता है और वह पहले से ज्यादा पॉपुलर हो जाता है। ऐसे में कुछ लोगों को लगता है लोकप्रियता के लिए मर्यादा और जिम्मेदारी की जरूरत नहीं।

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