नीरज कौशल का कॉलम:  जन्मसिद्ध नागरिकता के सवाल पर गम्भीर चर्चा की जानी चाहिए
टिपण्णी

नीरज कौशल का कॉलम: जन्मसिद्ध नागरिकता के सवाल पर गम्भीर चर्चा की जानी चाहिए

Spread the love




हम दूसरे देशों से अपेक्षा करते हैं कि वे भारतीयों का स्वागत करें, उन्हें स्थायी आवास और अंततः नागरिकता भी प्रदान करें। लेकिन हम शायद ही कभी सवाल उठाते हैं कि क्या भारत के अपने नागरिकता कानूनों में भी वैसा ही खुलापन है? आप्रवासियों के अधिकारों पर हमारी चिंता अकसर हमारी ही सीमाओं पर आकर रुक जाती है। यह विरोधाभास तब स्पष्ट रूप से दिखा था, जब ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में एक कार्यकारी आदेश जारी किया। इस आदेश में अवैध प्रवासियों और अस्थायी तौर पर निवास कर रहे लोगों के यहां जन्मे बच्चों के लिए स्वत: जन्मसिद्ध नागरिकता के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया। भारतीय मीडिया के एक वर्ग ने इस आदेश की आलोचना की और इसे अमेरिका की आप्रवासी परम्परा के विपरीत बताया। फिर 30 जून, 2026 को जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प के इस आदेश को अवैध करार दिया तो अधिकांश भारतीयों ने इसे निष्पक्षता और कानून के शासन की जीत बताते हुए फैसले का स्वागत किया। लेकिन यह जश्न एक असहज तथ्य की अनदेखी करता है। वो यह कि भारत खुद वर्षों पहले जन्मसिद्ध नागरिकता की व्यवस्था त्याग चुका है। संविधान के निर्माण के समय भारत भी स्वत: मिलने वाली जन्मसिद्ध नागरिकता प्रदान करता था। 1955 के मूल नागरिकता अधिनियम के तहत 26 जनवरी 1950 या उसके बाद भारत में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता था, भले ही उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो। हालांकि इसमें कुछ सीमित अपवाद थे, जैसे राजनयिकों या शत्रु देशों के नागरिकों की संतानें। समय के साथ नागरिकता कानून के दायरे को पहले 1986, और फिर 2003 के संशोधनों के जरिए सीमित कर दिया गया। हमने ट्रम्प के आदेश पर तो मुखरता से विरोध जताया, पर अपने कानून को लेकर चुप्पी साधे रहे। 1986 के संशोधन के जरिए भारतीय संसद ने जन्मसिद्ध नागरिकता की व्यवस्था समाप्त कर दी। इसके अनुसार 1 जुलाई 1987 या उसके बाद भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को नागरिकता तभी मिल सकती थी, जब उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो। 2003 में इस कानून में फिर संशोधन हुआ और प्रावधान किया गया कि 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद भारत में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के माता-पिता में से कोई एक भले ही भारतीय नागरिक हो, लेकिन फिर भी उसे नागरिकता का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। इसके लिए यह भी आवश्यक हो गया कि दूसरा अभिभावक अवैध प्रवासी न हो। यानी, भले आपके माता-पिता में से कोई एक भारतीय है और भले ही आपके दादा-परदादा तक भारत में ही जन्मे हों, तब भी आपको स्वत: नागरिकता नहीं मिल सकेगी। इन संशोधनों की पृष्ठभूमि में भारत में अवैध बांग्लादेशियों की मौजूदगी को लेकर चिंताएं रही हैं। लेकिन गौर करने वाली यह है कि भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या को लेकर लगाए गए सभी अनुमान अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे लोगों की तुलना में बहुत मामूली हैं। इसके अलावा भारत में नागरिकता प्राप्त करने की कानूनी प्रक्रिया भी कोई आसान नहीं है। नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारत दुनिया के कठोरतम शर्तें लागू करने वाले देशों में से एक है। सामान्यतः किसी विदेशी नागरिक को आवेदन के योग्य बनने से पहले सात वर्ष तक भारत में निवास करना पड़ता है और फिर भी नागरिकता देना पूरी तरह सरकार के विवेक पर ही निर्भर है। किसी भारतीय नागरिक से विवाह करने पर भी स्वतः नागरिकता नहीं मिलती। विदेश में जन्मे जीवनसाथी को भी नागरिक के रूप में पंजीकरण कराने से पहले लंबे समय तक निवास संबंधी शर्तों को पूरा करना पड़ता है। भारत में पीढ़ियों से रह रहे हजारों तिब्बती परिवार इस विसंगति का उदाहरण पेश करते हैं। उनमें से बहुत-से भारत में जन्मे, भारतीय स्कूलों में पढ़े, भारतीय भाषाएं बोलते हैं और भारत के अलावा किसी अन्य देश को अपना घर नहीं मानते। फिर भी कानून उन्हें स्वतः नागरिकता प्रदान नहीं करता। हम शैक्षणिक संस्थानों में तिब्बती शरणार्थियों और उनके वंशजों के लिए सीटें आरक्षित करते हैं, लेकिन यदि वे भारतीय नागरिक बनना चाहें तो उन्हें नौकरशाही की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। आखिरकार हर देश को यह तय करने का अधिकार है कि कौन उसका नागरिक बनेगा। लेकिन बौद्धिक ईमानदारी का तकाजा यही है कि हमें खुद को भी उन्हीं पैमानों पर परखना चाहिए, जिन्हें हम दूसरों पर लागू करना चाहते हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *