बचपन पर ‘ब्यूटी अटैक’; इटली ने बैठाई जांच:  बच्चों को एंटी‑एजिंग क्रीम बेच रहीं सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां, इटली सरकार का कड़ा रुख
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बचपन पर ‘ब्यूटी अटैक’; इटली ने बैठाई जांच: बच्चों को एंटी‑एजिंग क्रीम बेच रहीं सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां, इटली सरकार का कड़ा रुख

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सोशल मीडिया पर चमकती-दमकती त्वचा, महंगे सीरम और इन्फ्लुएंसर्स की लुभावनी बातें। ये बात सामान्य लग सकती हैं, लेकिन इसके पीछे सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियों की गहरी चाल छिपी हो सकती है।, जो अपने सौंदर्य उत्पाद बेचने के लिए बच्चों तक को एंटी एजिंग क्रीम बेच रही हैं। इटली के प्रतिस्पर्धा प्राधिकरण ने इसे बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत से खिलवाड़ माना है और फ्रांस के लग्जरी ग्रुप एलवीएमएच के दो बड़े ब्यूटी ब्रांड्स- सेफोरा और बेनिफिट के खिलाफ नाबालिगों को एडल्ट स्किनकेयर बेचने के आरोप में जांच शुरू की है। इटैलियन कॉम्पिटीशन अथॉरिटी के अनुसार, दोनों ब्रांड्स पर आरोप है कि फेशियल मास्क, सीरम और एंटी‑एजिंग क्रीम जैसे उत्पादों को ऐसे प्रमोट किया गया, जिससे वे 10 साल से कम उम्र की बच्चियों तक को आकर्षित करें। आरोप है कि उत्पादों पर यह जानकारी या तो गायब रही या भ्रामक तरीके से दी गई कि वे नाबालिगों के लिए न तो डिजाइन किए गए हैं और न ही उन पर ट्रायल हुए हैं। त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार, प्री‑टीन बच्चे रेटिनॉल (विटामिन ए आधारित सौंदर्य प्रसाधन), एक्सफोलिएटिंग एसिड (त्वचा की ऊपरी परत हटाते हैं) और हाई‑डोज विटामिन सी जैसे एक्टिव तत्वों वाले एडल्ट प्रोडक्ट्स को रोजमर्रा की स्किनकेयर रूटीन बना रहे हैं। डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि ऐसे एक्टिव्स बच्चों की नाजुक स्किन पर पर्याप्त रूप से टेस्ट ही नहीं किए गए; बिना चिकित्सकीय निगरानी इनके उपयोग से लालिमा, रैश, सन‑सेंसिटिविटी, डर्मेटाइटिस और लंबे समय तक चलने वाली एलर्जी का जोखिम बढ़ सकता है। भारत में भी उभरता खतरा- बच्चे भी ब्यूटी प्रॉडक्ट ले रहे सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां इस तरह से प्रचार करती हैं कि 10 साल तक के बच्चों में सेफोरा किड्स ट्रेंड का असर हो रहा है। सोशल मीडिया से प्रेरित होकर 10-13 साल के बच्चे रेटिनॉल और के‑ब्यूटी स्टाइल मल्टी‑स्टेप रूटीन अपना रहे हैं। इससे रैश और एलर्जी के केस बढ़े हैं। डर्मेटोलॉजिस्ट्स कहते हैं कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों को सौंदर्य क्रीम से बचाना चाहिए। विशेषज्ञ चेताते हैं कि लुक्स‑केंद्रित पहचान, कम आत्मसम्मान और एंग्जाइटी जैसे मानसिक जोखिम भारत के बच्चों के लिए भी उतने ही वास्तविक हैं, जितने यूरोप और अमेरिका में दिख रहे हैं।



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