पेरेंटिंग- बच्चा बहुत शेखी बघारता है:  बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, झूठ भी बोलता है, पेरेंटिंग में हमसे क्या गलती हुई, उसे कैसे बदलें?
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पेरेंटिंग- बच्चा बहुत शेखी बघारता है: बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, झूठ भी बोलता है, पेरेंटिंग में हमसे क्या गलती हुई, उसे कैसे बदलें?

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7 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं इंदौर से हूं। मेरा 6 साल का बेटा है। पिछले कुछ समय से मैं देख रही हूं कि वह दूसरों के सामने अक्सर शेखी बघारता है। बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है। कई बार ऐसी बातें भी कह देता है, जो सच नहीं होतीं। क्या इस उम्र में ऐसा व्यवहार सामान्य है? क्या यह सिर्फ बच्चों की कल्पनाशक्ति और अटेंशन पाने की कोशिश है या फिर असुरक्षा या पालन-पोषण से जुड़ा कोई संकेत? हम बिना डांटे उसके इस बिहेवियर को कैसे चेंज करें?

एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। 6 साल की उम्र में बच्चों का सामाजिक और भावनात्मक विकास तेजी से हो रहा होता है। इस उम्र में वे यह समझने लगते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। इसलिए कई बच्चे खुद को ज्यादा होशियार, ताकतवर या खास दिखाने की कोशिश करते हैं। कई बार वे अपनी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं या ऐसी बातें भी कह देते हैं, जो पूरी तरह सच नहीं होतीं।

बच्चा शेखी क्यों बघारता है?

लेकिन इसे हमेशा ‘झूठ’ या ‘खराब परवरिश’ मान लेना सही नहीं है। कई मामलों में यह बच्चे की कल्पनाशक्ति, अटेंशन पाने की इच्छा, आत्मविश्वास की कमी या सामाजिक पहचान बनाने की कोशिश हो सकती है। इसलिए बच्चे को डांटने या ‘झूठा’ कहने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। ग्राफिक में इसके संभावित कारण देखिए-

हर शेखी झूठ नहीं होती

जब कोई बच्चा बढ़ा-चढ़ाकर बात करता है, तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि वह जानबूझकर झूठ बोल रहा है। 5-7 साल की उम्र में बच्चों की कल्पनाशक्ति बहुत तेज होती है।

  • वे अक्सर अपनी कल्पना, इच्छाओं और वास्तविक अनुभवों को मिलाकर बातें करते हैं।
  • कई बार वे खुद को सुपरहीरो, सबसे तेज या सबसे अमीर बताने जैसी बातें भी कह देते हैं।
  • यह उनके मानसिक विकास का सामान्य हिस्सा हो सकता है।

यह झूठ है या कल्पना

हालांकि, अगर बच्चा बार-बार दूसरों को प्रभावित करने, तारीफ पाने या खुद को बेहतर दिखाने के लिए जानबूझकर गलत बातें कहता है, तो उसके पीछे आत्मविश्वास की कमी, ध्यान पाने की इच्छा या कोई भावनात्मक जरूरत हो सकती है। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा कल्पना कर रहा है या सच को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। इसे कुछ उदाहरणों से समझिए-

कल्पना (सामान्य)

  • “कल मैं चांद पर घूमने गया था।”
  • “मेरे घर में एक ड्रैगन रहता है।”
  • “मैं सुपरमैन की तरह उड़ सकता हूं।”
  • “मेरी बिल्ली मुझसे बातें करती है।”
  • “मैं जादू करके सब कुछ गायब कर सकता हूं।”

शेखी, झूठ या बढ़ा-चढ़ाकर कहना

  • “मेरे पापा ने मेरे लिए नई BMW खरीदी है।”
  • “मैं स्कूल में हमेशा फर्स्ट आता हूं।” (जबकि ऐसा नहीं है)
  • “मेरे पास सबसे महंगा वीडियो गेम है।” (जबकि नहीं है)
  • “मैंने अकेले पूरी क्रिकेट टीम को हरा दिया।”
  • “टीचर मुझे सबसे ज्यादा पसंद करती हैं।” (सिर्फ तारीफ पाने के लिए)

ऊपर के उदाहरणों से आप आसानी से झूठ और कल्पना के फर्क को समझ सकते हैं। इसलिए अपने बच्चे की कही बातों पर गौर करें और देखें कि वो झूठ है या उसकी कल्पना की उड़ान। अगर वो सचमुच झूठ या शेखी ही है तो हमें उसके पीछे के मनोविज्ञान और संभावित कारणों को समझने की जरूरत है।

इसके पीछे क्या मनोविज्ञान है?

1. अटेंशन पाने की इच्छा

अगर बच्चे को लगता है कि लोग उसकी बात तभी सुनते हैं, जब वह कुछ असाधारण या खास बताए, तो वह बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने लगता है।

2. असुरक्षा

अगर उसे लगता है कि दूसरे बच्चे उससे ज्यादा अच्छे, होशियार या तेज हैं, तो वह खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश कर सकता है।

3. कम आत्मसम्मान

जिस बच्चे को अपनी खूबियों पर भरोसा नहीं होता, वह दूसरों की नजरों में बड़ा बनने की कोशिश करता है।

4. बड़ों की नकल

अगर घर में बड़े लोग अक्सर अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं या दूसरों से तुलना करते हैं, तो बच्चा भी वही सीख सकता है।

5. कल्पनाशक्ति का विकास

इस उम्र में कल्पनाशक्ति बहुत सक्रिय होती है। इसलिए कई बार बच्चा कहानी और हकीकत का फर्क नहीं समझ पाता। वह कल्पना और वास्तविकता को मिलाकर बातें करता है।

बढ़ा-चढ़ाकर बोलना कब सामान्य है और कब इस पर ध्यान देने की जरूरत है, ग्राफिक में देखिए-

बच्चे के व्यवहार को कैसे समझें?

कई बार बच्चे अपनी किसी भावनात्मक जरूरत को व्यक्त करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। जैसेकि-

जब बच्चा कहता है- “मेरे पास सबसे बड़ा खिलौना है।” तो वह हमेशा खिलौने की बात नहीं कर रहा होता। हो सकता है, वह कहना चाहता हो-

  • “मुझे भी नोटिस करो।”
  • “मेरी भी तारीफ करो।”
  • “मैं भी खास हूं।”
  • “मुझे भी स्वीकार करो।”

यानी कई बार बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातों के पीछे बच्चे की भावनात्मक जरूरत छिपी होती है। अगर माता-पिता केवल शब्दों पर प्रतिक्रिया देंगे, तो समस्या बनी रहेगी। अगर वे भावना को समझेंगे, तो समाधान आसान होगा।

माता-पिता क्या करें?

1. सबके सामने शर्मिंदा न करें

  • अगर बच्चा गलत बात कहे, तो वहीं टोककर उसे अपमानित न करें।
  • बाद में अकेले में शांत तरीके से बात करें।

2. सच बोलने पर तारीफ करें

  • जब बच्चा सामान्य तरीके से, बिना बढ़ाए-चढ़ाए बात करे, तो उसकी तारीफ करें।
  • उसे महसूस कराएं कि सच बोलने पर भी उसे प्यार और सम्मान मिलेगा।

3. तुलना बिल्कुल न करें

  • “देखो, तुम्हारा दोस्त कितना अच्छा है।”
  • ऐसी बातें बच्चे की असुरक्षा बढ़ा सकती हैं।

4. उसके रियल अचीवमेंट्स की तारीफ करें

  • बच्चे से कहें- “मुझे अच्छा लगा कि तुमने मेहनत की।”
  • न कि- “तुम सबसे अच्छे हो।”

5. उसकी भावनाएं जानें

बच्चे से पूछें-

  • “क्या तुम चाहते थे कि सब तुम्हारी तारीफ करें?”
  • “उस समय तुम्हें कैसा लग रहा था?”
  • “तुम ऐसा क्यों कहना चाहते थे?”

इससे बच्चा खुलकर अपनी बात बताएगा।

कई बार माता-पिता अनजाने में बच्चे से कुछ ऐसी बातें कहते हैं, जो उन पर नेगेटिव प्रभाव डालती हैं। ग्राफिक में देखिए-

बच्चे से क्या कहें?

अगर बच्चा बढ़ा-चढ़ाकर बात करे तो शांत स्वर में कहें-

  • “चलो, अब सच वाली कहानी बताते हैं।”
  • “मुझे वही सुनना अच्छा लगता है, जो सच में हुआ।”
  • “सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए और मुझे तुम पर भरोसा है।”
  • “तुम्हें खास बनने के लिए झूठ बोलने की जरूरत नहीं है।”

ऐसी बातें बच्चे में ईमानदारी और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं।

बच्चे में कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं?

जिस बच्चे को अपने आप पर भरोसा होता है, उसे दूसरों को प्रभावित करने की जरूरत कम महसूस होती है। इसलिए केवल व्यवहार बदलने की कोशिश न करें, बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाने पर भी काम करें। इसके लिए ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ख्याल रखें।

कब चाइल्ड काउंसलर से मिलना चाहिए?

इन स्थितियों में चाइल्ड काउंसिलर से सलाह लें। अगर बच्चा-

  • हर बात में झूठ बोले, बढ़ा-चढ़ाकर बातें करे।
  • सच बताने के बाद भी अपनी गलत बात पर अड़ा रहे।
  • दोस्तों से उसके रिश्ते बिगड़ने लगें।
  • साथ में गुस्सा, एंग्जाइटी या आत्मविश्वास में कमी दिखे।
  • यह आदत लगातार बढ़ती जाए।
  • स्कूल से भी ऐसी शिकायतें आने लगें।

अंत में कहूंगी कि 6-7 साल की उम्र में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करना बच्चे के सामान्य विकास का हिस्सा हो सकता है। इसलिए हर बार इसे झूठ या बदतमीजी मानकर डांटना-मारना सही नहीं है।

माता-पिता अगर बच्चे की बात के पीछे छिपी भावना को समझें, उसे सुरक्षित माहौल दें, सच बोलने के लिए प्रोत्साहित करें और उसकी वास्तविक खूबियों की तारीफ करें, तो धीरे-धीरे यह व्यवहार अपने आप कम हो सकता है।

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