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तकनीकी बदलावों से भरी दुनिया में पली-बढ़ीं पिछली पीढ़ियों के विपरीत, जेन-जी कुछ हद तक जबकि जेन-अल्फा पूरी तरह से डिजिटल परिवेश में पैदा हुई है। बचपन से ही वे टैबलेट, स्मार्टफोन और एलेक्सा या गूगल असिस्टेंट जैसे वर्चुअल असिस्टेंट वाले उपकरणों के आदी हैं। हार्मोनी हेल्थकेयर की एक रिपोर्ट के अनुसार युवा पीढ़ी रोज औसतन 6 घंटे से ज्यादा फोन पर बिताती है। 73% किशोर रोजमर्रा के कामों और फैसलों के लिए एआई टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं या करने की योजना बना रहे हैं। ऐसे में मानसिक तनाव, अकेलेपन या भविष्य की चिंता के बीच शांति तलाशने का माध्यम भी डिजिटल होना स्वाभाविक है। रिसर्च गेट और फुलरयूथ इंस्टीट्यूट की स्टडीज के मुताबिक जेन-अल्फा की आस्था और आध्यात्मिकता भी डिजिटल संसाधनों, सोशल मीडिया और एल्गोरिदम से गहराई से प्रभावित हो रही है। युवा पीढ़ी पारंपरिक रूढ़ियों के बजाय वैल्यू-बेस्ड स्पिरिचुअलिटी की ओर बढ़ रही है। फुलरयूथ इंस्टीट्यूट के सर्वे – 68 फीसदी युवाओं का कहना है कि उनका विश्वास, धर्म या आध्यात्मिक यात्रा उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। गैर-धार्मिक किशोरों में भी, करीब एक तिहाई किशोर किसी न किसी सुपर पावर में विश्वास करते हैं। – हर 4 में से 1 जेन-अल्फा का कहना है कि ‘ऑनलाइन सीखी गई चीजों या ऑनलाइन मिले लोगों की वजह से उनका विश्वास (फेथ) बदल गया है।’ – हर 3 में से 1 जेन अल्फा का कहना है कि वे आमने-सामने की बातचीत के बजाय ऑनलाइन विश्वास या आध्यात्मिक विषयों के बारे में ज्यादा सीखते हैं। धर्म गुरु और धार्मिक संगठन भी जेन-जी और जेन-अल्फा को जोड़ने के लिए इंटरनेट, सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। डिजिटल माध्यम युवाओं की आस्था को नए आयाम – जेन-जी और जेन-अल्फा धार्मिक जानकारी के लिए यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम, चैटबॉट जैसे साधनों पर सबसे ज्यादा निर्भर है। विजुअल एनिमेशन, 3 डी पौराणिक कहानियां और छोटे आध्यात्मिक उपदेश उन्हें आकर्षित करते हैं। – युवा और किशोर केवल कथाएं सुन नहीं रहे हैं, बल्कि रोब्लॉक्स जैसे वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स पर डिजिटल रूप से निर्मित मंदिरों और धार्मिक उत्सवों का हिस्सा बन रहे हैं। एप-आधारित आरती, लाइव मंदिर दर्शन और एआई चालीसा/मंत्र एप्स ने भगवान से उनके जुड़ाव को सुलभ व व्यक्तिगत बना दिया है। जेन-जी और जेन अल्फा के बीच डिजिटल धार्मिकता भारत में एस्ट्रोलॉजी एप यूजर्स में करीब 60% जेन-जी हैं। स्पॉटिफाई के मुताबिक धार्मिक पॉडकास्ट लिसनिंग में 236% इजाफा हुआ। जेन-जी (1995-2010) – मेंटल हेल्थ के प्रति अत्यधिक जागरूक, वे स्ट्रेस मैनेज करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और जीवन में अर्थ खोजने के लिए डिजिटल साधनों का उपयोग करते हैं। जेन-अल्फा (2011-2025) – ध्यान संबंधी एप्स और सकारात्मक विचारों से भरपूर सामग्री के साथ बड़े होने के कारण, आध्यात्मिकता को दैनिक जीवन का हिस्सा मानते हैं। युवाओं और किशोरों के बीच बढ़ रहा धार्मिक एआई चैटबॉट का उपयोग गुरुग्राम के रहने वाले 20 साल के आरव सुबह फोन पर एप खोलकर अपने पसंदीदा मंदिर के दर्शन और आरती देखते हैं। करिअर या जीवन संबंधी किसी उलझन में वह एआई चैटबॉट पर जाकर पूछते हैं- ‘करिअर में असफलता मिलने पर क्या करूं?’ उनके लिए आस्था सिर्फ मंदिर जाना नहीं, फोन पर मिलने वाली व्यक्तिगत स्पिरिचुअल सर्विस है। आरव जैसे लाखों जेन-जी और जेन-अल्फा कहे जाने वाले युवा एआई-संचालित आध्यात्मिक सहायकों की ओर रुख कर रहे हैं। फेथजीपीटी, कुरानजीपीटी से लेकर टेक्स्ट विद जीसस तक आस्था अब फर्मवेयर से जुड़ गई है। इनसे उन्हें मार्गदर्शन और यहां तक कि वर्चुअल दर्शन तक तत्काल पहुंच मिल रही है। डिजिटल पूजा में हो रही बढ़ोतरी मध्यप्रदेश के नलखेड़ा स्थित बगलामुखी मंदिर के पुजारी मुकेश गुरु के मुताबिक जेन-जी और जेन-अल्फा द्वारा डिजिटल पूजा कराने के मामले साल भर में दोगुने से ज्यादा बढ़ गए हैं। ज्यादातर पूजा परीक्षा, नौकरी और गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड से संबंधित होती हैं। विदेशों से युवा भी डिजिटल पूजा करवाते हैं। युवा उनसे इंस्टाग्राम और वेबसाइट के जरिए जुड़ते हैं। कर्मकांड से ज्यादा सुकून अहम क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट काकोली राय कहती हैं, ‘डिजिटल युग की जेन-जी और जेन-अल्फा’ की आस्था अपने से पहले की पीढ़ियों से अलग है। ये हर बात को अपनी कसौटी पर परखती हैं और तभी भरोसा करती हैं। साइकोलॉजिस्ट विनय मिश्रा के मुताबिक, ‘इन पीढ़ियों के लिए आस्था इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें शांति और खुशी मिलती है।’
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