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- Barkha Dutt’s Column: In The Twisha Case, We Face A Mountain Of Unanswered Questions.
5 घंटे पहले
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बरखा दत्त – फाउंडिंग एडीटर मोजो स्टोरी।
ट्विशा शर्मा एक पूर्व मॉडल थीं, जो अपनी सास और पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह के घर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थीं। ट्विशा के पति समर्थ सिंह- जो पेशे से वकील हैं और ट्विशा की मृत्यु के तुरंत बाद फरार हो गए थे- और गिरिबाला अब सीबीआई की हिरासत में हैं।
किंतु यह मानने के लिए लगातार अधिक प्रमाण सामने आ रहे हैं कि यह दहेज की मांगों से त्रस्त होकर आत्महत्या करने वाली किसी महिला की कहानी नहीं है। ठोस तथ्य लगातार संकेत कर रहे हैं कि ट्विशा की मृत्यु सम्भवतः एक हिंसक हमले का परिणाम थी।
अपराध-स्थल के सीसीटीवी फुटेज हासिल करने को लेकर गिरिबाला सिंह की असामान्य बेचैनी इस बात का संकेत देती है कि शायद उनके पास छिपाने के लिए कुछ था। उनके आवास पर कैमरे लगाने वाले सीसीटीवी तकनीशियन ने पुष्टि की है कि वे घटनास्थल की फुटेज सुरक्षित करने को लेकर उत्सुक थीं। बहू की मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद उनके मन में ऐसा विचार क्यों आया? यह तो पुलिस की दिलचस्पी का विषय होना चाहिए।
बात केवल घर के भीतर लगे कैमरों तक सीमित नहीं थी। गिरिबाला के विरुद्ध सबसे गम्भीर संकेत उस ब्यूटी पार्लर से मिलता है, जहां ट्विशा को उनकी मृत्यु वाले दिन आखिरी बार देखा गया था। इस वीडियो में ट्विशा स्पष्ट रूप से सहज दिखाई देती हैं। पार्लर प्रबंधक ने हमें दिए एक साक्षात्कार में कहा भी कि उनमें चिंता या तनाव का कोई स्पष्ट संकेत दिखाई नहीं दिया।
पार्लर प्रबंधक ने यह भी पुष्टि की कि अगले दिन गिरिबाला ने उन्हें फोन कर यह जानने के लिए कई प्रश्न पूछे कि ट्विशा ने अपने बिलों का भुगतान किस प्रकार किया था। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गिरिबाला जानना चाहती थीं कि क्या पार्लर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, और वे उस फुटेज को प्राप्त करना चाहती थीं।
इसके तुरंत बाद वकीलों का एक समूह पार्लर पहुंचा और उसके संचालक से फुटेज उन्हें सौंपने की मांग करने लगा। यह न केवल गैर-कानूनी था, बल्कि यह गिरिबाला की हताशा को भी प्रकट करता है। क्या वे पार्लर के सीसीटीवी फुटेज को इसलिए अपने कब्जे में लेना चाहती थीं क्योंकि उसमें दिखाई देने वाली शांत और सहज ट्विशा की छवियां आत्महत्या संबंधी उनके दावों का खंडन करती थीं? टाइमलाइन भी आत्महत्या के कथानक से मेल नहीं खाती।
ट्विशा के परिवार ने मेरे साथ कॉल रिकॉर्ड साझा किए हैं, जिनसे पता चलता है कि उनकी मृत्यु वाले दिन रात 10 बजकर 5 मिनट पर अपने माता-पिता के साथ उनकी फोन पर अंतिम बातचीत हुई थी। समर्थ का दावा है कि ट्विशा ने रात 10.20 बजे फांसी लगाई। यदि ससुराल पक्ष के दावे को सही मानें कि उन्होंने एक एक्सरसाइज रिंग से लटककर आत्महत्या की, तो यह कोई ऐसा तत्काल किया जाने वाला कृत्य नहीं है, जिसे मात्र 15 मिनट की अवधि में अंजाम दिया जा सके।
सीबीआई अब 80 किलो वजन वाले एक स्ट्रक्चर का उपयोग करके यह जांच कर रही है कि वह रिंग इतना भार सहन भी कर सकती थी या नहीं। पुलिस से इस मामले में हुई प्रारंभिक चूकें भी स्तब्ध कर देने वाली हैं। वे केवल लापरवाही ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली सम्पर्कों के दखल का भी संकेत देती हैं। यह तथ्य कि ट्विशा के परिवार द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराए जाने से पहले ही गिरिबाला को अग्रिम जमानत मिल गईं, बहुत कुछ कहता है।
पहली पोस्टमार्टम प्रक्रिया के दौरान पुलिस ने वह रिंग भी उपलब्ध नहीं कराई, जिसका कथित रूप से ट्विशा ने फांसी लगाने के लिए उपयोग किया था। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मुझसे कहा है कि इसे मात्र भूल नहीं माना जा सकता। ट्विशा के परिवार के वकील ने भी प्रश्न उठाया है- क्या निष्पक्ष जांच के बिना निष्पक्ष मुकदमा सम्भव है? ट्विशा की मृत्यु से पहले उनके परिवार द्वारा की गई एक निजी ऑडियो रिकॉर्डिंग में गिरिबाला कथित रूप से अपनी बहू के लिए अपमानजनक और अश्लील भाषा का प्रयोग करती हुई सुनाई देती हैं।
माना जा रहा है कि पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रभावित की गई थी और सम्भवतः उसमें हेरफेर भी किया गया था। ट्विशा की ननद डॉ. राशि अबरोल ने मुझे दिए अपने दर्ज बयान में खुलासा किया है कि पहले पोस्टमार्टम के दौरान गिरिबाला की बहन- जो स्वयं एक चिकित्सक हैं- उस कक्ष में उपस्थित थीं, जहां शव-परीक्षण किया जा रहा था। यह नियमों और प्रक्रियाओं का स्पष्ट उल्लंघन था। ट्विशा के शरीर पर पाई गई सात चोटों का भी अब तक कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
गिरिबाला और उनके पुत्र ने यह दावा करने का प्रयास किया कि ये चोटें छत से सीढ़ियों के रास्ते शव को नीचे लाने के दौरान लगी थीं, लेकिन अब यह स्थापित हो चुका है कि ये सभी चोटें मृत्यु से पहले लगी थीं। यह तथ्य इस अंदेशे को जन्म देता है कि ट्विशा की मृत्यु से पहले उन पर हमला किया गया था, और सम्भव है कि वही हमला उनकी मृत्यु का कारण भी बना हो। गिरिबाला के प्रभावशाली स्थानीय सम्पर्कों ने इस आशंका को बल दिया है कि मामले में बड़े पैमाने पर लीपापोती की गई हो सकती है।
- वास्तव में इस मामले में इतने विरोधाभास मौजूद हैं और तथ्यों को छिपाने के इतने स्पष्ट प्रयास दिखाई देते हैं कि अनुत्तरित प्रश्नों का एक पहाड़ हमारे सामने खड़ा हो जाता है। इन तमाम सवालों की तह तक पहुंचना अब न्याय के लिए बहुत जरूरी हो गया है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)









