4 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी
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किताब का नाम: ‘भावना योग-नकारात्मकता का हल’
लेखक: मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी
प्रकाशक: निर्ग्रन्थ फाउंडेशन
मूल्य: 300 रुपए
हम सभी चाहते हैं कि जीवन में शांति हो, रिश्तों में मधुरता हो और मन हर परिस्थिति में संतुलित रहे। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं हो पाता। छोटी-छोटी नकारात्मक भावनाएं, जैसे गुस्सा, जलन, असंतोष, अहंकार, अविश्वास, अधीरता या तुलना हमारे भीतर जगह बना लेती हैं। बाहर से सब कुछ ठीक दिखाई देता है, लेकिन भीतर बेचैनी बनी रहती है।
सच्चाई यह है कि जीवन की ज्यादातर परेशानियों की शुरुआत बाहर नहीं, हमारे भीतर से होती है। इसलिए जब तक मन का मैल साफ नहीं होगा, तब तक सुख-सुविधाएं भी स्थायी शांति नहीं दे सकतीं।
इसी बात को बेहद सरल और व्यावहारिक ढंग से समझाती है जैन संत मुनिश्री 108 प्रमाणसागरजी की किताब ‘भावना योग–नकारात्मकता का हल’। यह किताब केवल आध्यात्मिक प्रवचन नहीं देती, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाले ऐसे उपाय बताती है, जिन्हें कोई भी व्यक्ति आसानी से अपना सकता है।
इस पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि इसमें जीवन की 20 सबसे सामान्य नकारात्मक भावनाओं को एक-एक करके समझाया गया है। हर भावना का कारण, उसका असर और उससे बाहर निकलने का रास्ता भी बताया गया है।

इस किताब का उद्देश्य
मुनिश्री प्रमाणसागरजी का संदेश बहुत स्पष्ट है- विचारों से लड़ने की जरूरत नहीं है, भावों को सही दिशा देने की जरूरत है।
जब मन के भाव शुद्ध होते हैं तो व्यवहार बदलता है, रिश्ते सुधरते हैं और जीवन में संतुलन आने लगता है। लेकिन जब भाव विकृत हो जाते हैं तो बाहर की सारी उपलब्धियां भी भीतर का खालीपन नहीं भर पातीं।
किताब में ‘अ’ अक्षर से शुरू होने वाले 20 नकारात्मक भावों का क्रमबद्ध विश्लेषण किया गया है-
अहंकार, असंतोष, अविश्वास, अवसाद, असहिष्णुता, अधीरता, अनिर्णय, अकर्मण्यता, अस्थिरता, असंयम, अविवेक, अनुत्साह, अश्रद्धा, अपमान, अपवित्रता, अशांति, अरुचि, अस्वीकृति, असंवेदनशीलता, अंधविश्वास
हर अध्याय में ये चार बातें विस्तार से समझाई गई हैं-
- यह भावना पैदा क्यों होती है?
- इसका जीवन पर क्या असर पड़ता है?
- इससे बाहर कैसे निकला जा सकता है?
- रोज 5–10 मिनट का कौन-सा भावना योग अभ्यास करना चाहिए?
यही इस पुस्तक को केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि अभ्यास करने की किताब बनाता है।

भावना योग आखिर है क्या?
नाम सुनकर लगता है कि यह कोई नया योग होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। भावना योग का अर्थ है- अपनी भावनाओं को पहचानना, उन्हें समझना और धीरे-धीरे सकारात्मक दिशा में बदलना।
लेखक का मानना है कि अधिकांश समस्याओं की जड़ घटनाएं नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी भावनाएं होती हैं। उदाहरण के लिए, असंतोष।
मुनिश्री लिखते हैं-
“संतोष वह है, जो भीतर से भर दे और असंतोष वह है, जो बाहर से खुद को भरना चाहे।”
आज सोशल मीडिया के दौर में तुलना पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। हम दूसरों की सफलता, जीवनशैली और उपलब्धियों को देखकर अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। यही तुलना धीरे-धीरे असंतोष में बदल जाती है।
इससे बाहर निकलने के लिए पुस्तक में पांच आत्मस्वीकृति वाक्य दिए गए हैं, जिन्हें रोज दोहराने की सलाह दी गई है।

अहंकार: सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला भाव
किताब का अहंकार वाला अध्याय बहुत प्रभावशाली है। लेखक कहते हैं-
अहंकार कहता है- “मैं कुछ हूं।”
आत्मजागरण कहता है- “मैं हूं।”
यानी जब तक हम खुद को किसी पहचान, पद, सफलता या उपलब्धि से जोड़कर देखते रहेंगे, तब तक टकराव बना रहेगा। लेकिन जैसे ही केवल ‘मैं हूं’ का भाव आएगा, विनम्रता अपने आप जन्म लेने लगेगी।
लेखक इसके तीन सरल उपाय बताते हैं-
- स्वीकार करना सीखें।
- विनम्र रहें।
- रोज आत्मनिरीक्षण करें।
अविश्वास: हर रिश्ते का सबसे बड़ा दुश्मन
किताब का यह अध्याय आज के समय में बेहद प्रासंगिक लगता है। मुनिश्री लिखते हैं-
“अविश्वास संबंधों में दरार पैदा कर देता है। मन की छोटी-सी शंका पूरे रिश्ते को कमजोर कर सकती है।”
वे बताते हैं कि अविश्वास अक्सर तीन कारणों से पैदा होता है-
- अधूरी जानकारी
- पुराने कटु अनुभव
- असुरक्षा की भावना
समाधान भी उतना ही सरल बताया गया है-
- शब्दों से पहले भाव समझिए।
- हर व्यक्ति को पुराने अनुभवों की नजर से मत देखिए।
- संवाद बनाए रखिए।
अवसाद: पहला कदम है स्वीकार करना
किताब का यह संदेश बहुत सहज और मानवीय है। जब मन टूटता है तो लोग अक्सर अपनी तकलीफ छिपाने लगते हैं। लेकिन लेखक कहते हैं कि दुख से भागने की बजाय उसे स्वीकार करना ही उससे बाहर निकलने की शुरुआत है। यदि आप यह कह पाते हैं- “हां, मैं दुखी हूं।” तो आप बदलाव की दिशा में पहला कदम उठा चुके हैं। यहीं से आशा की शुरुआत होती है।
असहिष्णुता: प्रतिक्रिया नहीं, समझ जरूरी
आज छोटी-सी बात पर गुस्सा आ जाना, बहस करना या संबंध बिगाड़ लेना आम हो गया है। मुनिश्री कहते हैं कि जो व्यक्ति गलत व्यवहार कर रहा है, वह केवल आलोचना का नहीं, करुणा का भी पात्र हो सकता है। वे रोज खुद से तीन सवाल पूछने की सलाह देते हैं-
- क्या मेरी प्रतिक्रिया सही थी?
- क्या मुझे थोड़ा शांत रहना चाहिए था?
- क्या मैं सामने वाले को ठीक से समझ पाया?

अधीरता और अस्थिरता: सफलता के दो बड़े दुश्मन
मुनिश्री लिखते हैं-
“अधीरता मन की दुर्बलता है। जहां अधीरता होगी, वहां गड़बड़ी होगी।”
आज हम हर चीज तुरंत चाहते हैं- परिणाम भी और सफलता भी। लेकिन प्रकृति का नियम है कि हर चीज अपने समय पर फल देती है। अस्थिर मन पर लेखक एक सुंदर उदाहरण देते हैं-
“जैसे हवा से डोलता दीपक स्थिर प्रकाश नहीं दे सकता, वैसे ही अस्थिर मन जीवन में बड़ी उपलब्धियां हासिल नहीं कर सकता।”
इसलिए स्थिरता ही आत्मदर्शन की पहली सीढ़ी है।
अनिर्णय: अवसरों का सबसे बड़ा हत्यारा
कई लोग इसलिए आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि वे निर्णय ही नहीं ले पाते। गलत निर्णय का डर उन्हें किसी भी निर्णय तक पहुंचने नहीं देता।
इस अध्याय में तीन संकल्प वाक्य दिए गए हैं-
- मैं प्रत्येक निर्णय में जागरूक, शांत और विवेकशील हूं।
- मैं सही समय पर सही निर्णय लूंगा।
- प्रभु कृपा से मैं निर्णय लेने में सक्षम हूं।
रोज इन वाक्यों को दोहराने से मन में आत्मविश्वास बढ़ने लगता है।

किताब का सबसे सुंदर संदेश: मंगल भावना
किताब का अंतिम अध्याय ‘मंगल भावना’ है। लेखक बताते हैं कि जब मन से अहंकार, जलन, क्रोध, असंतोष और अविश्वास जैसे भाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं, तब भीतर अपने आप शुभकामना और करुणा जन्म लेने लगती है।
यही भावना योग का अंतिम लक्ष्य है– अपने भीतर ऐसी मानसिक स्थिति विकसित करना, जहां हम अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी शुभ सोच सकें।
इसलिए हर अध्याय के अंत में छोटे-छोटे अभ्यास दिए गए हैं, जिन्हें 5–15 मिनट में किया जा सकता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपयोगिता है।
मेरी राय
मैंने यह किताब दो बार पढ़ी। पहली बार पढ़ते समय कई जगह रुकना पड़ा क्योंकि हर अध्याय अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करता है। दूसरी बार पढ़ते समय मैंने नोट्स बनाए और रोज एक-एक भावना पर काम करना शुरू किया।
सबसे बड़ा बदलाव मुझे तुलना की आदत में महसूस हुआ। अब जब भी मन में जलन, असंतोष या हीन भावना आती है, मैं किताब के वही पांच आत्मस्वीकृति वाले वाक्य दोहरा लेता हूं– “मैं जो हूं, पर्याप्त हूं।”
यह किताब किसी चमत्कार का वादा नहीं करती। यह धीरे-धीरे मन को बदलने का अभ्यास सिखाती है।
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