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हाल ही में टॉक्सिक फैन-कल्चर एक बार फिर हमारे सामने भयावह रूप में लौट आई। आईपीएल में ट्रैविस हेड और विराट कोहली के बीच हैंडशेक को लेकर जो विवाद हुआ, वह हेड की पत्नी और परिवार तक पहुंच गया। एक बार फिर हमने मर्यादाओं को टूटते देखा। लेकिन यह पहली बार नहीं हुआ था। हर बार जब कुछ ऐसा होता है, हम इन ट्रोल्स को प्रशंसक-भावना को कलंकित करते और कुछ घृणित हरकत करते देखते हैं। जबकि किसी को भी किसी के परिवार को निशाना बनाने का अधिकार नहीं है। यह एक ऐसा मसला है, जिसके बारे में जीरो-टॉलरेंस का रवैया जरूरी है। मैं स्वयं इस स्थिति को झेल चुका हूं और मैं जानता हूं कि आपकी मां, पत्नी या बच्चे को अपमानजनक नामों से पुकारा जाना कैसा लगता है। यही वह बिंदु है, जहां सोशल मीडिया गंदगी में बदल जाता है, और इसे नियंत्रित करने के लिए तुरंत कुछ किया जाना चाहिए। ट्विटर या अन्य सोशल मीडिया माध्यमों पर मौजूद टॉक्सिक प्रशंसकों की इस सेना को भी समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति के प्रति अंधनिष्ठा दिखाकर वे बड़े उद्देश्य को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। ट्रैविस हेड की पत्नी पर अपमानजनक टिप्पणियां करके वे विराट कोहली के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध नहीं कर रहे होते। वास्तव में, सच्चाई यह है कि व्यक्ति-केंद्रित प्रशंसक-संस्कृति दिन-ब-दिन अधिक क्रूर और विषैली होती जा रही है। व्यक्ति-पूजा भारतीय खेलों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रही है। कई बार ऐसा लगता है मानो प्रशंसक इस बात से भी संतुष्ट हो जाते हैं कि उनके प्रिय खिलाड़ी ने रन बना लिए, फिर भले ही टीम हार गई हो। इसी तर्ज पर यह भी सोचा जाने लगता है कि आखिर किसी ने हमारे प्रिय खिलाड़ी के साथ विवाद करने की हिम्मत कैसे की? तो उसके परिवार को भी इसमें घसीटा जाए। तेंडुलकर और द्रविड़ का दौर कोहली और रोहित से पहले था। और उनसे पहले गावस्कर और कपिल का युग था। लेकिन जिस प्रकार का विषाक्त फैन-वॉर विराट और रोहित के समर्थकों के बीच दिखाई देता है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। और इसमें सबसे बड़ा नुकसान भारतीय क्रिकेट का ही हो रहा है। उपरोक्त घटना के बाद ट्रैविस हेड के समर्थन का दावा करने वाले फेक अकाउंट्स भी सामने आ गए, जिनका उपयोग कोहली और उनके परिजनों को अपमानित करने के लिए किया जा गया। यह भी उतना ही निंदनीय है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय ‘प्रशंसकों’ का ही एक वर्ग इसके पीछे है। उनके लिए यह केवल अपने निजी द्वेष और कोहली-विरोध को निकालने का एक और अवसर है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अलग-अलग प्रशंसक-समूह आपस में लड़ रहे हैं और इसके लिए एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं। अब समय आ गया है कि इन ट्रोल्स के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। इसे हमेशा के लिए रोका जाए। घृणा फैलाना जिस नए भारत की पहचान बनता जा रहा है, वह उस भारत की अवधारणा नहीं है, जिसके पक्ष में हम खड़े हैं। यह वह नहीं है, जिसमें हम विश्वास करते हैं, और एक समाज के रूप में हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। विवाद केवल एक मैच के दौरान हुए हैंडशेक का है, और किसी भी खेल में हमेशा कोई न कोई विजेता और कोई न कोई पराजित होता है। इसका किसी के परिवार, पत्नी या बेटी से कोई संबंध नहीं है। और जो कोई भी इस मर्यादा का उल्लंघन करता है, वह या तो भ्रमग्रस्त है या सभ्य समाज के योग्य नहीं है। दूसरे, यह एक बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है कि लोगों ने अब महसूस करना शुरू कर दिया है कि उन्हें कुछ भी कहने और कहकर बच निकलने का अधिकार है। समय के साथ सोशल मीडिया अनियंत्रित गाली-गलौज का क्षेत्र बन चुका है। एक स्तर पर यह अश्लील और घृणित है, तो दूसरे स्तर पर बेहद चिंताजनक भी। यह लोगों के भीतर मौजूद गहरी बेचैनी और गुस्से को उजागर करता है। हमने इस स्थिति को बहुत लंबे समय तक बने रहने दिया है, और सोशल मीडिया का विमर्श उस हालत का प्रतिबिम्ब है, जिसमें हम स्वयं को फंसा चुके हैं। वास्तविक प्रशंसकों के रूप में आपको इसके विरुद्ध खड़ा होना होगा और इसे रोकना होगा। यह बहुत जरूरी है कि प्रशंसक इस स्थिति की गंभीरता को समझें और इस घृणा-प्रदर्शन को समाप्त करें। बहुत से लोग कहेंगे कि यह हमारे जीवन पर पूरी तरह हावी हो चुके सोशल मीडिया का एक बाय-प्रोडक्ट है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि इसके विरुद्ध शायद ही कभी कोई संगठित प्रतिरोध हुआ है। इक्का-दुक्का बयान इस समस्या का समाधान नहीं करेंगे। इसके लिए सामूहिक कार्रवाई आवश्यक है, तभी ये ट्रोल रुकेंगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को भी समझना होगा कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है कि लोगों ने महसूस करना शुरू कर दिया है कि उन्हें कुछ भी कहने और कहकर बच निकलने का अधिकार है। समय के साथ सोशल मीडिया अनियंत्रित गाली-गलौज का क्षेत्र बन चुका है। यह चिंताजनक है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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