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- US Iran Conflict: Trump Strategy & Impact On Indian Economy | Middle East
5 घंटे पहले
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मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार
ईरान युद्ध का अंत कैसे होगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। सऊदी अरब पर हूतियों की आक्रामकता हालात को और पेचीदा बनाती है। ट्रम्प भी समय-समय पर फिर से सैन्य अभियान शुरू करने की धमकी देते रहते हैं।
उन्होंने कहा है कि वे नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों तक कार्रवाई रोककर रखेंगे, जबकि इस दौरान क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य जमावड़ा बढ़ता रहेगा। एक अनुमान के मुताबिक, अमेरिका की कुल सैन्य ताकत का 30 प्रतिशत तक हिस्सा अब इस क्षेत्र में ईरान के खिलाफ तैनात है। इससे सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका हासिल क्या करना चाहता है?
ईरान ट्रम्प की धमकियों को गंभीरता से लेता है। वह फिर से युद्ध छिड़ने की आशंका के लिए तैयारी कर रहा है। उसने होर्मुज, फारस और ओमान की खाड़ी में हमले बढ़ा दिए हैं। टकराव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।
संघर्ष के आठ महीने बीत जाने के बाद भी अमेरिका के मनसूबे साफ नहीं हैं। ट्रम्प अलग-अलग मौकों पर ईरान की परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को खत्म करने, होर्मुज को फिर से खुलवाने और ईरानी सभ्यता को ही नष्ट कर देने की बात कह चुके हैं।
ये एक-दूसरे से बिल्कुल अलग लक्ष्य हैं, जिनके लिए अलग-अलग सैन्य रणनीतियों की जरूरत होगी और उनसे जुड़े जोखिम भी बहुत अलग होंगे। परमाणु ठिकानों को हवाई हमलों से निशाना बनाने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन ईरान की मिसाइल क्षमताओं को निष्क्रिय करना कहीं अधिक कठिन होगा।
सत्ता परिवर्तन के लिए ईरान को मजबूर करना या उससे बिना शर्त आत्मसमर्पण कराना एक लंबे सैन्य अभियान की मांग कर सकता है, जिसमें सफलता की कोई गारंटी नहीं होगी और अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने का जोखिम भी बहुत अधिक होगा।
इसके विपरीत, ईरान के लक्ष्य पहचानना आसान है। वह अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का अंत, भविष्य में हमले न होने की गारंटी, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और ऐसा समझौता चाहता है, जो उसके क्षेत्रीय हितों की रक्षा करे।
वह होर्मुज के संचालन से जुड़े इंतजामों में भी अपनी भूमिका चाहता है, क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि वह किन रियायतों को स्वीकारने के लिए तैयार होगा और क्या अमेरिका उन्हें मानने को राजी भी होगा। तो दोनों तरफ ऊहापोह है।
भारत के लिए यह सब बहुत मायने रखता है। यदि संघर्ष फिर से भड़कता है और पूरे मध्य-पूर्व में फैल जाता है, तो ऊर्जा की ऊंची कीमतों, शिपिंग में बाधाओं, महंगाई और सरकारी वित्त पर दबाव के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था को तत्काल झटके लगेंगे।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। तेल के एक बैरल की कीमत में हर एक डॉलर की लगातार बढ़ोतरी से आयात बिल में भारी इजाफा होता है, जिससे व्यापार संतुलन बिगड़ता है और एक मुद्रा के रूप में रुपये पर भी दबाव बढ़ता है।
हाल में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल रही है। संघर्ष और बढ़ा, तो यह कीमत 120 डॉलर या उससे भी ऊपर जा सकती है। इससे ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ेगी, जिसका असर उपभोक्ता कीमतों पर पड़ेगा और मौद्रिक व राजकोषीय प्रबंधन और जटिल हो जाएगा।
सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जिससे घरेलू बजट पहले ही दबाव में है। तेल की कीमतों में एक और तेज उछाल इन मुश्किलों को बढ़ा देगा। शेयर बाजार पर भी नए सिरे से दबाव पड़ेगा, क्योंकि निवेशक आर्थिक विकास की संभावनाओं, कंपनियों की लागत और बाहरी जोखिमों का फिर से आकलन करेंगे।
इसका असर ऊर्जा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। मध्य-पूर्व के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र से बचकर उड़ान भरने वाले नागरिक विमानों को भारत और यूरोप के बीच की यात्रा में कई अतिरिक्त घंटे लग सकते हैं। इससे एविएशन कंपनियों की लागत बढ़ेगी और यात्रियों को असुविधा होगी।
शिपिंग और खाड़ी देशों की आर्थिक गतिविधियों में बाधा से व्यापार, रोजगार और निवेश भी प्रभावित होंगे। संघर्ष जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही बड़ा जोखिम होगा कि क्षेत्रीय सुरक्षा संकट भारत के लिए एक व्यापक आर्थिक समस्या बन जाए।
हम यह तो तय नहीं कर सकते कि युद्ध का अंत कैसे होगा। लेकिन हम इसके प्रतिकूल परिणामों को कम जरूर कर सकते हैं। हम विदेशों में बसे अपने नागरिकों की सुरक्षा कर सकते हैं और कूटनीतिक गुंजाइश बनाए रख सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








