मनोवैज्ञानिकों का दावा- अकेलापन हमेशा कमजोरी नहीं:  करीबी दोस्त न होने के भी फायदे; ये आत्मविश्वास बढ़ाता है, हमेशा समझदार दिखने का दबाव नहीं होता
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मनोवैज्ञानिकों का दावा- अकेलापन हमेशा कमजोरी नहीं: करीबी दोस्त न होने के भी फायदे; ये आत्मविश्वास बढ़ाता है, हमेशा समझदार दिखने का दबाव नहीं होता

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समाज हमें सिखाता है कि दोस्त होना जरूरी है। करीबी दोस्त न हों तो इसे कमी माना जाता है, जैसे कुछ गलत हो गया हो। लेकिन हालिया मनोवैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि करीबी दोस्त न होने के अपने फायदे हैं। कई बार दोस्तों की गैरमौजूदगी इंसान को खुद से मिलने का मौका देती है। जब सलाह देने वाला कोई नहीं होता है, तब फैसले खुद लेने पड़ते हैं, जैसे- नौकरी बदलनी हो, रिश्ते पर फैसला हो या जीवन की दिशा तय करना हो। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बार-बार अपने फैसलों के साथ खड़े रहना आत्मविश्वास को भीतर से मजबूत करता है। यह तालियों पर नहीं, जिम्मेदारी पर टिका भरोसा होता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। भावनात्मक मजबूती मिलती है दोस्त न हों तो दुख जल्दी बाहर नहीं निकलता। कोई तुरंत ‘सब ठीक हो जाएगा’, कहने वाला नहीं होता। लेकिन रिसर्च बताती है कि जो लोग बिना तुरंत सहारे के अपनी भावनाओं को सहना सीख लेते हैं, उनकी भावनात्मक मजबूती ज्यादा स्थायी होती है। अमेरिका में होप कॉलेज के मनोवैज्ञानिक डैरिल टोंजेरेन के अनुसार, अकेले रहने से ये समझ विकसित होती है कि दर्द आता है। थोड़ा ठहरता है और फिर चला भी जाता है। इससे अंतर्मन की आवाज साफ होने लगती है। जब कोई आपकी सोच को लगातार सही या गलत ठहराने वाला नहीं होता, तब आप खुद से सवाल करते हैं। आत्ममंथन करते हैं। अकेले सिनेमा जाना, खाना खाना, सफर करना। शुरुआत में यह असहज लगता है, लेकिन कुछ समय बाद वह देखता है कि सब ठीक हैै। मनोवैज्ञानिक इसे आत्मबल या आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण कहते हैं। दोस्तों के बिना इंसान अभिनय भी कम करता है। न ‘मजाकिया दोस्त’ बनने का दबाव, न ‘हमेशा समझदार’ दिखने की मजबूरी। इस खाली जगह में असली पसंद-नापसंद उभरती है- क्या सच में अच्छा लगता है और क्या सिर्फ साथ निभाने के लिए किया जाता था। डैरिल टोंजेरेन कहते हैं कि अर्थपूर्ण जीवन की समझ अक्सर अकेलेपन में गहराती है। जब सामाजिक शोर कम होता है, तब व्यक्ति अपने मूल्यों को ज्यादा साफ देख पाता है। खुद से रिश्ता: तन्हाई छीनती नहीं, बहुत कुछ सिखाती है नई रिसर्च और जीवन के अनुभवों की कहानियां बताती हैं कि तन्हाई का दौर हमेशा नकारात्मक नहीं होता, बल्कि यह आपको अंदर से मजबूत, स्पष्ट और भावनात्मक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का पाठ बन सकता है। अपनापन पाने के लिए दिखावा करने की जरूरत नहीं: टोंजेरेन कहते हैं कि करीबी दोस्ती में भी छिपा हुआ समायोजन होता है। जो बात हंसी दिलाए, उसे बढ़ा देते हैं। जो राय तनाव बढ़ाए, उसे कम कर देते हैं। समूह के साथ लय-ताल मिलाने लगते हैं। दोस्त न हों, समूह न हो तो यह कोरियोग्राफी कम होती है। ऐसे में अकेले होने पर आपका खुद पर भरोसा ज्यादा विश्वसनीय तरीके से बढ़ता है।



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