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मेरे पिताजी एक बहुत ही साधारण परिवार में पैदा हुए। बचपन में पेड़ के नीचे पंड्या जी के पास पढ़ते थे। पांचवीं कक्षा में सरकारी स्कूल में दाखिला हुआ। पढ़ाई में तेज निकले तो फिर गवर्नमेंट कॉलेज, रतलाम से बीएससी पूरी की। एमएससी की पढ़ाई के लिए वे इंदौर गए, एक छोटी-सी स्कॉलरशिप के सहारे। लेकिन होस्टल का खर्च बहुत था, पैसे कम पड़ रहे थे। इसलिए पढ़ाई छोड़कर शिक्षक बनने का सोच रहे थे। तभी उनके एक प्रोफेसर ने कहा- तुम बार्क (भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर) का एंट्रेंस एग्जाम क्यों नहीं देते? इंटरव्यू देने वे बंबई आए। आने-जाने का किराया भी मिला। एक महीने बाद जब कोई कॉल नहीं आया, तो उन्होंने सोचा- बात खत्म हो गई। तभी एक दिन उनके चचेरे भाई दौड़ते हुए होस्टल में पहुंचे और बोले, तुम्हारा सिलेक्शन हो गया। तार गया था रतलाम, लेकिन कोई समझ नहीं पाया, क्योंकि वह अंग्रेजी में था। खैर, इस तरह मेरे पिताजी की जिंदगी ने एक बिल्कुल अलग मोड़ लिया। वे अंतरिक्ष-वैज्ञानिक बने, देश-विदेश में उन्होंने नाम कमाया। यह सफर संभव हुआ एक ऐसी परीक्षा की वजह से, जिसमें कोई ऊंच-नीच, कोई भेदभाव नहीं था। बस यही मौका आज इस देश का हर युवा मांग रहा है! हम पढ़ेंगे। हम लड़ेंगे। हम मेहनत के दम पर आगे बढ़ेंगे। बस आप हमें आश्वासन दो कि यह परीक्षा खरी है। अगर दे सको तो आप बाइज्जत बरी हैं। यह हक उनका बनता है। वे इस देश की जनता हैं। जब इतना भी हम न कर पाए, तब वे सड़क पर उतर आए। उनमें अगर आक्रोश है, तो किसका दोष है? जो लोग पेपर खरीद रहे हैं, उनके भी मां-बाप हैं। उनकी औलाद से ज्यादा वो नालायक हैं। कहते हैं कि कॉम्पीटिशन बढ़ गया है, करना पड़ता है। पकड़े गए तो पैसा है, कौन डरता है? जिसने पेपर लीक किया, उसके लिए तो वो धंधा है। देखो, वह एक एंटरप्राइजिंग बंदा है। उसने देखा एक सुनहरा मौका, और मार दिया सीधा चौका। अगर हम कहते- बेटा, चीटिंग से बेहतर तुम फेल हो जाओ। डॉक्टर नहीं बन सकते, कुछ और बन जाओ। वही होता मां-बाप का फर्ज निभाना। वही होता मिट्टी का कर्ज चुकाना।
इसलिए सजा होनी चाहिए कड़ी। डंका बजे शहर में यही। कसूर सिर्फ बेचने वाले का नहीं होता, खरीदने वाला भी खोटा होता है। लाखों के सपने जब चूर हुए, कुछ खुदकुशी पर मजबूर हुए, तो इन लोगों को रात में नींद आती है? क्या उनकी आत्मा नहीं पुकारती है? आज ही सुना, कुछ लोग दूध में केमिकल मिला रहे हैं। क्या वे चैन की रोटी खा रहे हैं? खैर, करोड़ों के पुल सिर्फ चालीस दिन बाद गिर जाते हैं। वो इसलिए कि आप सीमेंट में धूल मिलाते हैं। नेता लोग बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन देखो उनके बच्चे कहां रहते हैं। खैर, इस देश में जिसे रहना है, उसका बस इतना कहना है- परीक्षा विद्यार्थी के लिए एक जंग है। हार-जीत तो होगी, जीवन का अंग है। लेकिन जब योद्धा को छल-कपट से हराया जाता है, उसका आक्रोश पूरे समाज पर छा जाता है। पढ़ो-लिखो, कुछ बनो- हम कहते हैं। बच्चे सुबह चार बजे उठ बैठते हैं। दिलो-जान लगाकर खूब पढ़ते हैं। मोबाइल एयरप्लेन मोड पर रखते हैं। मां-बाप केबल टीवी कटवा देते हैं। दोस्त आ गया, तो उसे डांट देते हैं। एक ही साल की तो बात है। सफल हो गए, तो ठाठ है। इस आशा की पटरी पर देश की गाड़ी चल रही है। मेहनत के ईंधन पर आग जल रही है।
जब यह गाड़ी पटरी से उतर गई, समझो लोगों की आस मर गई।
किसी एक की नौकरी का सवाल नहीं है। किसी एक के भविष्य का बवाल नहीं है। हमारा देश जिस नींव पर टिका हुआ है, आज लगता है सब बिका हुआ है।
देश की सबसे बड़ी पूंजी नौजवान हैं। उनके सपने और अरमान हैं।
अगर उनका भरोसा टूट गया, समझो देश अंदर से फूट गया।
आओ एक नया इंडिया बनाएं, जहां पैसा नहीं, पसीना रंग लाए। हम पढ़ेंगे। हम लड़ेंगे। मेहनत के दम पर बढ़ेंगे। आप हमें आश्वासन दो कि यह परीक्षा खरी है। दे सको तो आप बाइज्जत बरी हैं। यह हक उनका बनता है। वे इस देश की जनता हैं। जब इतना भी न कर पाए, तब वे सड़क पर उतर आए। उनमें अगर आक्रोश है, तो किसका दोष है?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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