रसरंग में आपके अधिकार:  चिट फंड: राशि का भुगतान न होना ‘सेवा’ में कमी
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रसरंग में आपके अधिकार: चिट फंड: राशि का भुगतान न होना ‘सेवा’ में कमी

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गौरव पाठक4 घंटे पहले

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भारत में बचत के लिए लाखों लोग चिट फंड साधन का इस्तेमाल करते हैं। इसे चिट फंड अधिनियम, 1982 के तहत नियंत्रित भी किया जाता है। हालांकि इसके बावजूद चिट फंड कंपनियों और सदस्यों (सब्सक्राइबर्स) के बीच बकाया भुगतान, अनधिकृत शुल्कों की कटौती और जमा राशि की गलत जब्ती को लेकर अक्सर विवाद होते रहते हैं। आज हम देखेंगे कि चिट फंड सदस्यों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के अंतर्गत कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हैं और हाल के न्यायिक निर्णयों के आलोक में उनके लिए कौन- से कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।

उपभोक्ता फोरम के अधिकार क्षेत्र रक्षित एम. शाह बनाम महावीर चिट फंड्स एंड फाइनेंस (2014) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने यह स्पष्ट किया था कि चिट फंड सेवाएं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की ‘सेवा’ (सर्विस) की परिभाषा के तहत आती हैं। आयोग ने कहा कि ‘कोई भी ग्राहक जो चिट फंड में भाग लेता है, वह यह अपेक्षा करता है कि परिपक्वता पर उसे समय पर भुगतान मिलेगा।’ अतः चिट फंड संचालकों को सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) के अंतर्गत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। श्रीराम चिट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम राघाचंद एसोसिएट्स (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि चिट फंड सदस्य उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत लेकर जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ये साबित करने की जिम्मेदारी सेवा प्रदाता की है कि सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए ली गई थी। जब तक कंपनी यह सिद्ध नहीं करती, तब तक सदस्य को धारा 2(7) के अंतर्गत उपभोक्ता माना जाएगा।

सेवा में कमी चिट की अवधि पूरी होने के बाद भुगतान न करना सेवा में कमी माना जाता है। मंजुला बनाम श्रीराम चिट्स (कर्नाटक) प्राइवेट लिमिटेड (2023) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने पाया कि सभी मासिक किश्तें समय से चुकाने के बावजूद कंपनी ने 5 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया। आयोग ने पूरी चिट राशि 9 फीसदी वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया।

अनधिकृत कटौती चिट कंपनियां सदस्यों के खातों से मनमानी ढंग से कटौती नहीं कर सकतीं। एक मामले में आयोग ने पाया कि बिना पूर्व सूचना के 1,03,120 रुपए की कटौती प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। आयोग ने वैध कटौतियों के बाद 1,56,312 रुपए की वापसी का आदेश दिया।

सदस्यता समाप्त करना चिट कंपनियों को सदस्यता समाप्त करने से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। चिट फंड अधिनियम की धारा 28 के अनुसार सदस्यता समाप्त करने से पहले उचित नोटिस देना जरूरी है। शेफाली लिमिटेड (2023) मामले में आयोग ने पाया कि कंपनी ने एजेंट के जरिए हुई भुगतान प्रविष्टियों के बावजूद सदस्यता समाप्त कर दी। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने 3,60,000 रुपए के मुआवजा के आदेश को बरकरार रखा।

सबूत-दस्तावेजों का महत्व सदस्यों को पासबुक, रसीदें और भुगतान के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजों को संभालकर रखना चाहिए। जब विवाद उत्पन्न होते हैं, तो प्रदीप कुमार बनाम पोस्ट मास्टर जनरल (2022) के सिद्धांत लागू होते हैं। इसके अनुसार अगर कोई भुगतान एजेंट के जरिए हुआ है, तो सभी भुगतानों की आधिकारिक रसीद लेना अनिवार्य है।

पीड़ित उपभोक्ता क्या करें? उपभोक्ता फोरम में जाने से पहले पीड़ित सदस्य को चिट फंड कंपनी को कानूनी नोटिस भेजना चाहिए। यदि कंपनी राज्य कानूनों के तहत पंजीकृत है, तो शिकायत चिट्स रजिस्ट्रार के पास भी की जा सकती है। कानून ईमानदार सदस्यों को कंपनियों की मनमानियों से ठोस सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि चिट फंड वैधानिक आर्थिक विकल्प हो सकते हैं, लेकिन सदस्यों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहना चाहिए और सभी लेन-देन का पक्का रिकॉर्ड जरूर रखना चाहिए। पीड़ित सदस्य अपने क्षेत्राधिकार के अनुसार उपयुक्त उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कर सकते हैं। आमतौर पर उपभोक्ता फोरम निम्नलिखित राहत देता है: – जमा राशि की वापसी ब्याज सहित करने का आदेश दे सकता है। – मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजा देने का आदेश दे सकता है। – मुकदमे पर वकील इत्यादि की जो फीस लगती है, उसके खर्च की भरपाई का आदेश दे सकता है।

(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)



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