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फिल्मों के मशहूर एक्टर बलराज साहनी जी से कौन परिचित नहीं होगा! आज मेरे हिस्से के किस्से में बात इन्हीं बलराज जी की। बात कुछ महीनों पुरानी है। मैं और जावेद अख्तर साहब कार से साथ में लौट रहे थे। जावेद साहब के घर से थोड़ा पहले बलराज साहनी साहब का बंगला पड़ता है। वहां दो फाइव स्टार होटल भी हैं, इसलिए ट्रैफिक जाम था। वहां गाड़ी रुकी तो मैंने देखा कि बलराज साहनी साहब के बंगले पर ऊपर से प्लास्टिक डला है और बंगले की हालत बहुत ही जर्जर हो रही है। इस पर मैंने जावेद साहब से कहा, “देखिए, चालीस साल में देखते-देखते मेरी आंखों के सामने यह बंगला कैसा था और कैसा हो गया।’ जावेद साहब बोले, मैंने तो इसकी असली रौनक देखी है, जब बलराज साहनी जिंदा थे। बलराज साहनी जी के बंगले से बिल्कुल लगी हुई जो बिल्डिंग है, उसका नाम है परछाइयां। ‘परछाइयां’ साहिर लुधियानवी साहब की गजलों के संग्रह का भी नाम था। और परछाइयां में ही साहिर साहब रहते थे। जावेद साहब ने यह भी बताया कि वे तो साहिर साहब के घर बराबर आया-जाया करते थे।
इस पर मैंने कहा, “जावेद साहब, मैंने साहिर साहब का वह घर देखा है। मुझे खरीदने के लिए उसका ऑफर भी हुआ था। मैं देखकर हिल गया था। इतनी बुरी हालत में था।’ वह मंजर आज तक मेरे जेहन में कायम है। उस पर मैंने पूरा कॉलम लिखा था, जो आप सबने पढ़ा था और उसके लिए मुझे बहुत संदेश भी आए थे। मैंने जावेद साहब से कहा कि बलराज साहब के बंगले को आप किसी तरह बचा लीजिए। इस पर जावेद साहब बोले, “मैं बलराज साहब की बेटी शबनम को जानता हूं। उनसे किसी तरह संपर्क करने की कोशिश करता हूं और पता करता हूं कि इस बंगले की हालत ऐसी क्यों हो रही है। हो सकेगा तो मैं उनकी मदद करने की भी कोशिश करूंगा।’ खैर, बात आई-गई हो गई। आज मुझे किसी ने बताया कि बलराज साहनी साहब का बंगला टूट गया है। तो मैंने फौरन मजहर नदियाडवाला, जो मेरे अजीज हैं और परछाइयां में ही रहते हैं, उन्हें फोन लगाया। तो वे बोले, “हां, आपको सही पता लगा है। रूमी भाई, बंगला टूट गया है। मैं भी शबनम को ढूंढ़ रहा हूं क्योंकि पड़ोसी होने के नाते मेरा बचपन से रिश्ता है। मिल जाए तो पूछूं कि शायद मैं उनके किसी काम आ सकूं। अभी तो मैं यह सुन रहा हूं कि किसी बिल्डर ने काम शुरू किया है।’ अभी कुछ दिन पहले ही मैंने बलराज जी के बेटे परीक्षित साहनी जी को यह कहते सुना था कि, “पापा ने बड़े शौक से बंगला बनवाया था। उन्होंने फर्स्ट फ्लोर पर मेरे लिए एक कमरा पढ़ने के लिए, एक कमरा पेंटिंग के लिए और एक कमरा सोने के लिए बनवाया था।’ ये सब किस्से-कहानियां जिंदा रहेंगे हमेशा, मगर बंगला ही नहीं रहा। वह भी एक किस्सा बनकर रह गया। बलराज जी रावलपिंडी में पैदा हुए, लाहौर में पढ़ाई की। फिर वहां से बंगाल आ गए। कलकत्ता में शांतिनिकेतन में नौकरी की। फिर बीबीसी में काम करने के लिए लंदन चले गए। फिर मुंबई आ गए। थिएटर किया, एक्टिंग की। अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाकर, इतनी दुनिया घूमकर उन्होंने मुंबई में अपना आखिरी आशियाना बनाया था, जो अब खत्म हो गया। इसी बात पर मुझे एक शेर याद आ रहा है : “घर की तामीर तो अब तसव्वुर में ही हो सकती है
अपने नक्शे के मुताबिक ये जमीन कुछ कम है।’ जब साहिर साहब का उजड़ा हुआ घर देखा, तब भी दिल इतना ही दुखी हुआ था। जब राजेश खन्ना का आशियाना आशीर्वाद टूटा, तब भी मुझे दुख हुआ था। और जब राज कपूर का बंगला टूटा, तब भी मुझे बहुत तकलीफ हुई थी। खैर, घर रहे न रहे, काम और नाम इतना बड़ा है कि वह कभी नहीं मिट सकता। बलराज जी से जुड़ा एक वाकया मुझे पत्रकार राजेश बादल जी ने सुनाया था, जिन्होंने इन पर काफी कुछ लिखा है। जब देश की आजादी के तुरंत बाद कम्युनिस्ट पार्टी को बैन कर दिया था तो पार्टी के सदस्यों को भी अरेस्ट करके जेलों मंे डाला जा रहा था। बलराज साहनी को भी अरेस्ट कर लिया गया था। उस वक्त के. आसिफ अपनी एक मूवी ‘हलचल’ पर काम कर रहे थे। उनकी मूवी की शूटिंग थी। तो आसिफ अधिकारियों की अनुमति से बलराज जी को शूटिंग पर लेकर आए। उस फिल्म में बलराज जी जेलर की भूमिका निभा रहे थे और शूटिंग वाले दिन वे जेलर की वर्दी में ही थे। उसी समय साहिर साहब का भी वहां आना हो गया, जो स्वयं भी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। बलराज जी की जेलर की वर्दी को देखकर उन्हें लगा कि यह कोई पुलिसवाला है और अगर इसने मुझे देख लिया मुझे भी अरेस्ट कर लिया जाएगा। तो वे चुपचाप वहां से खिसक लिए। बाद में दोनों पक्के दोस्त बन गए थे और पड़ोसी भी हो गए थे। फिर जब साहिर जी ने उन्हें यह किस्सा सुनाया तो वे दोनों काफी हंसे थे। आज बलराज साहनी जी की याद में उनकी फिल्म काबुलीवाला का यह गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए : ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल कुरबान……
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