रूमी जाफरी7 घंटे पहले
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सनी देओल के साथ राजकुमार संतोषी।
आजकल हमारी फिल्म इंडस्ट्री में एक फिल्म की बहुत चर्चा हो रही है। यह है ‘बंटवारा 1947’। कल मुझे राजकुमार संतोषी जी और आमिर खान के साथ यशराज स्टूडियो में यह फिल्म देखने का मौका मिला। फिल्म बहुत खूबसूरत और लाजवाब बनी है। मैं जब घर आकर लेटा तो मेरे जहन में सिर्फ ‘बंटवारा 1947’ ही चलती रही। तभी ख्याल आया कि मैंने राजकुमार संतोषी जी पर आज तक कोई कॉलम नहीं लिखा। तो आज बात राजकुमार संतोषी जी की।
राजकुमार संतोषी जी बहुत कम उम्र से ही काम करने निकल पड़े थे और डायरेक्शन में असिस्टेंट लग गए थे। उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट तब आया, जब वे गोविंद निहलानी जी के असिस्टेंट बने। ‘अर्धसत्य’ और ‘विजेता’ में वे गोविंद निहलानी जी के चीफ असिस्टेंट थे। तभी उनके जहन में यह बात आ गई कि मुझे अपनी फिल्म बनानी है और उन्होंने कहानी पर काम करना शुरू कर दिया। कहानी लिखने के बाद राज जी ने इसे एक प्रोड्यूसर को सुनाया, जिनका नाम था पी. सुब्बाराव। उन्हें यह कहानी बहुत पसंद आई। उन्होंने जेब में हाथ डाला तो उसमें दो-दो रुपए के दो सिक्के थे। उन्होंने वे चार रुपए राजकुमार संतोषी जी को दिए और उन्हें फिल्म के लिए साइन कर लिया।
फिर सुब्बाराव ने पूछा, ‘तुम्हारा हीरो कौन होगा?’ दरअसल, राज जी को अपनी कहानी में हीरो के रोल के लिए सिर्फ एक ही शख्स दिखाई देता था – सनी देओल। इसलिए राज जी ने कहा, ‘सनी देओल।’ सुब्बाराव जी इस पर राजी हो गए और उनसे संपर्क करने को कहा।
उस जमाने में हर ऑफिस में एक टेलीफोन डायरेक्टरी रखी रहती थी। गोविंद जी के ऑफिस में भी एक डायरेक्टरी थी। राज जी ने उसमें से सनी देओल के घर का नंबर निकाला और फोन कर दिया। उनकी सनी के सेक्रेटरी जतिन राजगुरु ये बात हुई। उन्होंने राजगुरु से कहा, ‘मैं गोविंद निहलानी जी का चीफ असिस्टेंट हूं और मैंने एक कहानी लिखी है, जो मैं सनी देओल को सुनाना चाहता हूं।’
जतिन राजगुरु जी ने सोचा कि अगर ये गोविंद जी के चीफ असिस्टेंट हैं तो इनके अंदर भी कुछ बात तो होगी। उन्होंने सनी से मिलने का समय तय कर दिया। राज जी बंगले पर पहुंचे और उन्होंने सनी देओल को कहानी सुनाई। सनी को कहानी बहुत पसंद आई। उस समय सनी देओल की कीमत धर्म जी से भी ज्यादा थी। उन्होंने 15 लाख रुपए मांगे। सुब्बाराव जी सनी के ड्राइंग रूम में बैठे थे। उन्होंने राज जी को बाहर गार्डन में बुलाया और कहा, ‘प्राइस ज्यादा है। इनको बोलो कि 11 लाख ले लें। फिल्म अगर 100 दिन चलेगी तो मैं चार लाख रुपए और दे दूंगा। इस तरह 15 लाख हो जाएंगे।’
राज जी वापस ड्राइंग रूम में आए और सनी को पूरी बात बताई। सनी ने पूछा, ‘मैं इसका क्या मतलब समझूं?’ राज जी ने कहा, ‘मैं पिक्चर बहुत अच्छी और बहुत मेहनत से बनाने वाला हूं। मुझे यकीन है कि यह सुपरहिट होगी और 100 दिन पूरे करेगी। आपको 15 लाख रुपए ही मिलेंगे।’ सनी हंसे और उन्होंने फिल्म के लिए हां कर दी।
मगर प्रोड्यूसर सुब्बाराव मद्रास गए और लौटकर नहीं आए। कई महीने गुजर गए। फिर एक दिन सनी देओल ने राज जी को चांदीवली स्टूडियो बुलाया। राज जी ने बताया कि प्रोड्यूसर का कुछ पता नहीं है। सनी ने पूछा कि अगर यह फिल्म मैं प्रोड्यूस करूं तो तुम्हें कोई ऐतराज तो नहीं है? फिर बोले, सुब्बाराव के पैसे वापस कर देते हैं। फिर पूछा, ‘कितने पैसे दिए हैं?’ राज जी ने कहा, ‘चार रुपए।’ सनी खूब हंसे और बोले, ‘मैं चार रुपए नहीं, उनको आठ-दस रुपए वापस दे दूंगा।’
राज जी ने सुब्बाराव को फोन कर बताया कि सनी खुद फिल्म प्रोड्यूस करना चाहते हैं। हालांकि इसके बाद सनी ने खुद फिल्म प्रोड्यूस न करने का फैसला किया। उन्होंने करीम मोरानी और अली मोरानी से बात की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। एक-दो और लोगों से बात करने के बाद उन्होंने कहा कि मेरे फूफा (धर्म जी के जीजा) विक्रम सिंह दहल से बात करते हैं। विक्रम सिंह ने कहानी सुनी और कहा, ‘इंस्पेक्टर का रोल बढ़ा दो और उसमें एक और हीरो ले लो। दो हीरो होंगे तो रिकवरी हो जाएगी। तब मैं फिल्म बनाता हूं।’ इस पर सनी को जिद आ गई। उन्होंने कहा, ‘अब तो यह फिल्म मैं ही प्रोड्यूस करूंगा।’
इस फिल्म का किस्सा थोड़ा लंबा है। इसलिए आज का कॉलम राजेश रेड्डी के इस शेर के साथ खत्म करते हैं। अगले कॉलम में इस किस्से को पूरा करते हुए राजकुमार जी के कुछ और किस्से सुनेंगे:
दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं।








