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चूंकि घर और दफ्तर के बीच की दूरी कम है, इसलिए मैं साइकिल से ही काम पर जाती हूं। लेकिन दक्षिणी दिल्ली के अरबिंदो मार्ग और हौज खास मार्केट- जहां हम मान सकते हैं कि नियम-कानून का पालन अन्य शहरों की तुलना में ठीक ही होगा- वहां भी पढ़े-लिखे अमीर गाड़ीवालों का व्यवहार अचंभित करता है। हमारे तमाम शहरों में पार्किंग की सख्त कमी है। उदाहरण के लिए, सरकारी आंकड़ों के अनुसार अहमदाबाद में 7 लाख फोर-व्हीलर हैं, लेकिन ऑथराइज्ड पार्किंग 6000 से भी कम है! जहां पार्किंग की पर्याप्त सुविधा है भी (जैसे हौज खास मार्केट में सड़क पर और अंडरग्राउंड पार्किंग उपलब्ध है), वहां भी सड़क के बीचों-बीच लोगों की बड़ी गाड़ियां खड़ी होती हैं। कभी-कभी लोग गाड़ी में ही बैठे, फोन पर व्यस्त रहते हैं या कुछ खा-पी रहे होते हैं, जैसे कि अपने ड्रॉइंग रूम में बैठे हों। क्यों? सिर्फ इसलिए कि पार्किंग के 30 रुपए उन्हें खलते हैं। कुछ लोगों का मानना था कि सस्ती उबर-ओला टैक्सी से सुधार होगा। लोग टैक्सी लेंगे तो निजी गाड़ी सड़क पर नहीं खड़ी रहेगी। लेकिन बड़ी सड़कों के छायादार हिस्सों में भी- सवारी की राह में, खाना खाते हुए या आराम करते हुए टैक्सी की कतारें दिखती हैं। मार्केट में सड़क पर पार्किंग ज्यादातर पैरेलल नहीं है, तो सड़क का बड़ा हिस्सा गाड़ियां घेर लेती हैं। पूरा रास्ता जाम हो जाता है। साइकिल सवार इससे कम प्रभावित होते हैं। साइकिल जाम में भी निकल जाती है। आगे पहुंचने पर दिखता है कि जाम करने वाले गाड़ी मालिक/ड्राइवर पीछे परेशान लोगों से बेपरवाह आराम फरमा रहे हैं। एक की मनमर्जी कइयों का नुकसान करती हैं। सड़क पर पार्क करने वाली गाड़ियां यातायात को जाम कर देती हैं, वो एक पब्लिक न्यूसन्स हैं। जाम से समय की बर्बादी होती है, साथ ही पेट्रोल की खपत और प्रदूषण भी बढ़ते हैं। सड़क संकरी होने की वजह से मोटर/दोपहिया गाड़ी वालों को सड़क के बीच चलना पड़ता है, जिससे एक्सीडेंट का डर रहता है। देश के कई शहरों में लाखों गाड़ियों को सार्वजनिक मार्गों पर, साल भर मुफ्त में रखने की इजाजत है। यह भी एक गंभीर मुद्दा है। अन्य देशों में सड़क पर गाड़ी खड़ी रखने के सख्त नियम हैं। यूके में जब गाड़ी अपने घर के बाहर सड़क पर पार्क करते हैं, तो उन्हें 3, 6 या 12 महीनों का पार्किंग परमिट खरीदना पड़ता है। इसकी कीमत गाड़ी के प्रकार के अनुसार होती है। ज्यादा प्रदूषण वाले वाहनों का परमिट महंगा है। वहां पर एक गाड़ी का सालाना पार्किंग परमिट 90-300 पाउंड तक होता है। कहने को तो दिल्ली में भी इस तरह के परमिट हैं। लेकिन मोटरगाड़ी नहीं, सड़क पर रेहड़ीवालों के लिए। हौज खास में 4×6 फीट (छोटी गाड़ी भी अंदाजन इतनी ही जगह घेरती है) की रेहड़ी का सालाना परमिट 4254 रुपए है। यदि दिल्ली की 20 लाख गाड़ियों में से आधी सार्वजनिक सड़क पर हों और उन पर यही नियम-दर लागू हो, तो लगभग 400 करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त होगा। 2024-25 में दिल्ली में महिलाओं के लिए फ्री बस योजना के लिए 340 करोड़ का बजट था। उस पर रेवड़ी के नाम पर खूब चर्चा होती है, लेकिन सालाना गाड़ियों से हो रहे 400 करोड़ के नुकसान की कोई गिनती नहीं की जाती है। राजधानी की सड़कों को देखकर कोई सोच सकता है कि पार्किंग नीति में सड़क पर 11 कैटेगरी में से पहला अधिकार पैदल, साइकल और दिव्यांगजन का है, फिर रेहड़ी वालों का और उसके बाद में निजी गाड़ियों के लिए पिकअप/ड्रॉप, ईवी और पेड पार्किंग है। लेकिन असल में इसका उलटा हो रहा होता है और यह बात दूसरे शहरों के लिए भी इतनी ही सही है। कॉर्पोरेशन अतिक्रमण के खिलाफ नियमित रूप से एक्शन लेती रहती है, लेकिन सार्वजनिक मार्ग पर निजी गाड़ियों की बात कोई नहीं करता। इसे हम अतिक्रमण के रूप में क्यों नहीं पहचानते? हम यह भूल जाते हैं कि सड़कें आखिरकार सार्वजनिक संपत्ति है। जो लाखों की गाड़ी खरीद सकते हैं, हजारों का पेट्रोल जला सकते हैं, उनसे सार्वजनिक मार्ग पर गाड़ी खड़ी करने की कुछ कीमत क्यों न वसूली जाए?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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