हद से ज्यादा आत्मनिर्भर हैं तो परेशान रहेंगे:  काम का बोझ बांटें, खुद से कहें- चुनौती अकेले नहीं, मिलकर सुलझाएंगे
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हद से ज्यादा आत्मनिर्भर हैं तो परेशान रहेंगे: काम का बोझ बांटें, खुद से कहें- चुनौती अकेले नहीं, मिलकर सुलझाएंगे

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लंदन की रहने वालीं सियोन जोंस के पिता आईसीयू में भर्ती हुए, तो उन्होंने अकेले ही सारी जिम्मेदारी उठा ली। डॉक्टरों से बात करना, नोट्स लेना, इलाज समझना-सब कुछ खुद किया। अत्यधिक तनाव से उनके बाल झड़ने लगे, फिर भी उन्होंने करीबियों से मदद नहीं मांगी। मनोवैज्ञानिक कैथलीन सैक्टन कहती हैं, ‘इन दिनों अकेले ही सबकुछ करने (हाइपर इंडिपेंडेंस) को ताकत का प्रतीक माना जाने लगा है। पर असल में यह अकेलेपन, थकावट व रिश्तों से दूरी की वजह बन सकता है।’ क्या नुकसान हैं इस आदत के और इससे कैसे उबरें, जानिए… जानबूझकर मदद लें: कैथलीन कहती हैं,‘यह समस्या अक्सर बचपन से जुड़ी होती है। जब माता-पिता भावनात्मक रूप से मौजूद या भरोसेमंद नहीं होते, तो बच्चा खुद पर निर्भर रहना सीखता है। ऐसे में ‘सहने की आदत’ बन जाती है’-किसी पर भरोसा नहीं, तो खुद ही सब करना होगा’। कैथलीन सुझाव देती हैं,‘सबसे पहले स्वीकार करें कि सब कुछ खुद संभालने की जिद आपको अकेला कर रही है। डर छोड़ें कि दूसरों पर भरोसा करने से वे आपको निराश करेंगे। जानबूझकर दूसरों की मदद लें, नतीजे मनचाहे न भी हों, तो स्वीकार करें। यह पूर्णता के जाल से बाहर निकलने में मदद करेगा।’ धीरे-धीरे खुलें: 43 साल तक एकल रहीं, लाइफ कोच और पॉडकॉस्टर उर्वशी लाड को लगता था कि मदद मांगने से वे कमजोर दिखेंगी। लेकिन थेरेपी व जर्नलिंग से धीरे-धीरे खुद को खोलना सीखा। अब वे शादी करने जा रही हैं। उन्होंने पहली बार किसी को कॉफी खरीदने दी, तो असहज लगा। पर यही छोटी शुरुआत रिश्तों में बदलाव लाई। अब वे लाइफ कोच हैं और अपने जैसी महिलाओं को मदद लेने के लिए प्रेरित करती हैं। बडी सिस्टम बनाएं: मनोवैज्ञानिक डॉ. सारा हार्सटिच कहती हैं,‘किसी ऐसे व्यक्ति (दोस्त/पार्टनर) को चुनें जो आपसे पूरी तरह अलग काम करता हो। हफ्ते में एक बार ‘बडी’ साथ बैठकर अपने काम के बोझ को साझा करें। उनसे कोई एक सलाह जरूर मांगें। भरोसा बढ़ाएं: मनोवैज्ञानिक नादिया रहमान कहती हैं,‘यह समझना जरूरी है कि इंसान रिश्तों व आपसी सहयोग के लिए बने हैं। मदद लेना कमजोरी नहीं, सामान्य मानवीय व्यवहार है। जब भी चुनौती सामने आए, तो खुद से कहें, ‘इसे अकेले नहीं, मिलकर हल करना है। अगर आदत गहराई से जड़ जमा चुकी है तो ट्रॉमा-आधारित थेरेपी लें। यह पुराने अनुभव सुलझाकर भरोसा बढ़ाने में मदद करती है।’



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