अमिताभ कांत का कॉलम:  एक ‘ईवी क्रांति’ अब हमारे लिए बहुत जरूरी हो गई है
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अमिताभ कांत का कॉलम: एक ‘ईवी क्रांति’ अब हमारे लिए बहुत जरूरी हो गई है

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युद्ध तो फिलहाल दो हफ्तों के लिए थम गया, लेकिन यह भारत के ऊर्जा-परिदृश्य के लिए एक चेतावनी जरूर दे गया है। हम अपने कच्चे तेल की जरूरतों का 87% से अधिक आयात करते हैं और इसके पांचवें हिस्से से ज्यादा हिस्सा ऐसे क्षेत्र से गुजरता है, जो युद्धकाल में बेहद अस्थिर रहा है। ऐसे में पेट्रोलियम के सवाल को रणनीतिक जोखिम के तौर पर देखना चाहिए और परिवहन के इलेक्ट्रिफिकेशन के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना चाहिए। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है। यह बाजार हमारी जीडीपी में भी करीब 7% का योगदान और लाखों रोजगार देता है। लेकिन आज यह सेक्टर अहम मोड़ पर है। वैश्विक तकनीकी बदलाव ऑटो इंडस्ट्री को इंटरनल कम्बशन इंजन (आईसीई) तकनीक से हटाकर तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन की ओर ले जा रहे हैं। बदलाव उम्मीद से कहीं तेज हो रहा है। ऐसे में हमें ये पांच कदम उठाने की जरूरत है : 1. आईसीई वाहनों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने का लक्ष्य तय करना चाहिए। इसमें 2030 तक नई बिक्री में 100% इलेक्ट्रिफिकेशन हासिल किया जा सकता है। यूके और ईयू 2035 का लक्ष्य तय कर चुके हैं। इंडोनेशिया, थाईलैंड, ताइवान भी इन्हें हटाने की समय-सीमा तय कर चुके हैं। हम धीमा रवैया नहीं अपना सकते। आईसीई हटाने की स्पष्ट समय-सीमा उद्योग को भरोसा देगी, विनिर्माण और सप्लाई चेन में निवेश बढ़ेगा। इससे ईवी बाजार पनपेगा। 2. चीन में नई कार बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी 50%, यूरोप में 20% से अधिक, अमेरिका में 10% से अधिक है। लेकिन भारत में यह 4% ही है। ऐसे में इस क्षेत्र को छोटे-छोटे नहीं, व्यापक संरचनात्मक बदलाव चाहिए। कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इफिशियंसी मानकों (कैफे) के तौर पर नीति उपकरण पहले से मौजूद हैं। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने अगले चरण का मसौदा तो जारी कर दिया, लेकिन मानक अभी तय नहीं हुए। यह देरी अनिश्चितता पैदा करती है। स्पष्ट सालाना ईवी लक्ष्य तय होने चाहिए और ऐसे प्रावधान हटने चाहिए, जो वास्तविक प्रगति को कमजोर करते हैं। नीति आयोग की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के अनुरूप 2030 तक 30% इलेक्ट्रिक कार बिक्री का लक्ष्य तय हो। 3. भारी वाहनों का इलेक्ट्रिफिकेशन अब महज आकांक्षा नहीं रहा। यह संभव भी है और जरूरी भी। प्रधानमंत्री ने संसद में 15 हजार इलेक्ट्रिक बसों की तैनाती और परिवहन में वैकल्पिक ऊर्जा के विस्तार के बारे में बताया है। 10900 करोड़ रुपए की पीएम ई-ड्राइव योजना इस प्रतिबद्धता को दर्शाती है। अब अगला कदम इन बसों की संख्या बढ़ाना है, जिसमें निजी व स्कूल बसों को शामिल करना होगा। ट्रकों का इलेक्ट्रिफिकेशन भी बहुत जरूरी है, क्योंकि इनकी संख्या भले 3% हो, लेकिन ये परिवहन उत्सर्जन में 45% हिस्सेदारी रखते हैं। पीएम ई-ड्राइव योजना में ई-ट्रकों के लिए 500 करोड़ की राशि शुरुआत कही जा सकती है, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। संसद की स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट के अनुसार ई-बसों, ई-ट्रकों और ई-एम्बुलेंस की तैनाती अभी शून्य है। 4. ईवी के लिए चार्जिंग ढांचा जरूरी है। देश में 60% से अधिक शहरी आबादी बहुमंजिला इमारतों या साझा आवासों में रहती है। इनमें निजी चार्जर लगाने के लिए कई स्तर की मंजूरी लेनी पड़ती है। इस प्रक्रिया को आसान करने के लिए भारत को ‘राइट टु चार्ज’ का कानून बनाना होगा। मनमानी मंजूरियों के झंझटों में फंसने के बजाय हर उस व्यक्ति को बुनियादी सुरक्षा मानकों के तहत चार्जर लगाने की अनुमति मिलनी चाहिए, जिसके पास निर्धारित पार्किंग है। 5. हालांकि इकोसिस्टम को तेल से इलेक्ट्रिक की ओर ले जाने का मतलब यह नहीं कि हम पश्चिम एशिया जैसी निर्भरता अब चीन पर बना लें। वैश्विक बैटरी उत्पादन में 80% की भागदारी के साथ चीन का इस बाजार में दबदबा है। ऐसे में हमें खनिज सोर्सिंग, शोधन, सेल निर्माण, पैक असेंबली और री-साइकलिंग तक समूची बैटरी वैल्यू चेन में क्षमता बढ़ानी होगी। ईवी बदलावों के लिए स्पष्टता और क्रियान्वयन चाहिए। आज किया गया फैसला आने वाले दशकों के लिए सप्लाई चेन, पूंजी प्रवाह व तकनीकी नेतृत्व की दिशा तय करेगा। ये 5 सूत्रीय योजना हमारी तात्कालिक जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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