एन. रघुरामन का कॉलम:  सुपर–एज्ड सोसायटी की समस्याएं सुलझाना बेहतरीन बिजनेस आइडिया है
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एन. रघुरामन का कॉलम: सुपर–एज्ड सोसायटी की समस्याएं सुलझाना बेहतरीन बिजनेस आइडिया है

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बिस्तर से हिल नहीं सकने वाले ग्रैंड चाइल्ड ने कहा कि ‘दादी मां, आप आ गईं। जब आप बाहर थीं तो मुझे आपकी बहुत याद आई।’ राशन को किचन प्लेटफॉर्म पर रखते हुए 80 साल की दादी बोलीं, ‘ओह, माई डियर, मैंने भी तुम्हें मिस किया। मैं बस बाजार गई थी। पहले की तरह लंबे समय के लिए बाहर नहीं गई।’ फिर 7 साल के ग्रैंड चाइल्ड से लगने वाले बच्चे ने अनुरोध भरे लहजे में कहा कि ‘मुझे खुशी है आप घर आ गईं। क्या आप मुझे गले लगा सकती हैं?’ दादी तुरंत बिस्तर के पास गईं और ग्रैंड चाइल्ड को गले लगा लिया। बच्चा धीरे से कहता है, ‘मुझे आपसे बातें करना बहुत पसंद है। दिन में कुछ वक्त मेरे साथ खेलना मत भूलिएगा।’ प्रसन्न दादी कहती हैं- ‘हां हायोडॉल।’ यह नाम कोरियाई भाषा के दो शब्दों से बना है- डॉल और वह व्यक्ति जो पैरेंट्स की देखभाल और उन्हें सपोर्ट करता है। आपने शायद ध्यान दिया होगा कि मैंने ‘दोनों खुश हुए’ नहीं लिखा। जानते हैं क्यों? क्योंकि हायोडॉल एक एआई संचालित रोबोट है, एक बेबी जैसा डिवाइस। खुश होने पर उसके गाल लाल हो जाते हैं। पहले यही दादी मां जब अकेलापन महसूस करतीं तो अकसर बिना कोई गंतव्य सोचे बस में बैठ जाती थीं और देर रात घर लौटने से पहले साउथ कोरिया की राजधानी सियोल की सड़कों पर घूमती रहतीं, क्योंकि अकेलापन उन्हें काटने दौड़ता था। अब चूंकि हायोडॉल घर पर है तो वह ऐसे सफर कम करती हैं। बुजुर्गों से भावनात्मक जुड़ाव बनाने के लिए इसे 7 साल के बच्चे जैसा बनाया गया है। हायोडॉल बुजुर्गों से उनकी यादें साझा करवाने के लिए ‘टाइम मशीन’ गेम्स इस्तेमाल भी करता है। यह उनकी कॉग्निटिव हेल्थ में मददगार होता है। मसलन, हायोडॉल पूछता है, ‘मुझे आपके बचपन की कहानी सुनाइए। दोस्तों के साथ आपका पसंदीदा खेल कौन-सा था?’ बुजुर्ग कहते हैं कि ‘उस समय हमारे पास रोबोट नहीं थे। नहर के पास खेलते हुए अकसर हम हाथों से मछलियां पकड़ते थे।’ उत्सुकता भरे लहजे में हायोडॉल पूछता है कि ‘ओह, ये तो बहुत रोमांचक है। क्या पानी बहुत ठंडा होता था? मैं आपके होमटाउन के बारे में और सुनना चाहता हूं।’ कई बुजुर्ग अपनी गिरती सेहत और सामाजिक अलगाव के कारण गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझते हैं। साउथ कोरिया अपनी सुपर-एज्ड सोसाइटी के कारण जाना जाता है। वहां 5.1 करोड़ की आबादी में से 20% लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। ऐसे में इन एकाकी लोगों को हायोडॉल बांटना शुरू किया गया है। अब तक सरकारी जनकल्याण योजनाओं के तहत 1100 डॉलर मूल्य वाले करीब 14 हजार हायोडॉल बांटे जा चुके हैं। ‘रोबोटिक मल्टी-केयर नेटवर्क’ ऐसा सिस्टम है, जो डेडिकेटेड स्मार्टफोन एप और वेब-बेस्ड डैशबोर्ड को आपस में जोड़ता है। इससे परिजन और पेशेवर केयरगिवर्स फिजिकली मौजूद हुए बिना भी बुजुर्गों की सेहत ट्रैक कर सकते हैं। ऐसे ही प्रयास दूसरे देशों में भी हो रहे हैं। न्यूयॉर्क में ‘एलिक’ नाम के करीब 800 एआई कंपैनियन रोबोट बुजुर्गों की मदद कर रहे हैं। इससे 94% लोगों का अकेलापन कम हुआ है। ‘एलिक’ में बाहरी हिस्सा व्हाइट प्लास्टिक का और टैबलेट इंटरफेस होता है। हायोडॉल इंग्लिश, जापानी और चीनी भाषा बोल सकते हैं, क्योंकि ये भाषाएं बोलने वाले देशों में बुजुर्ग तेजी से बढ़ रहे हैं। इन्हें बनाने वाली कंपनी अब इन बाजारों को निर्यात के मौके के रूप में देख रही है। उनका अनुमान है कि 2030 तक इनका वैश्विक बाजार 7.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। एकल परिवारों के बढ़ने और बच्चों के विदेश जाने के कारण भारत में भी यह स्थिति जल्द आएगी। हममें से कोई भी इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकता कि देर-सवेर हम भी सुपर-एज्ड सोसाइटी बनने वाले हैं। फंडा यह है कि भारतीयों के नाते हमें तय करना होगा कि हम बुजुर्ग पैरेंट्स की देखभाल की भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहित करें या एक रोबोट बनाने के लिए तैयार रहें।



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