अमिताभ कांत का कॉलम:  देश को परीक्षाओं के लिए एक नई प्रणाली की आवश्यकता है
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अमिताभ कांत का कॉलम: देश को परीक्षाओं के लिए एक नई प्रणाली की आवश्यकता है

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पहली असफलता के बाद नीट की दुबारा हुई परीक्षा बगैर किसी बड़ी समस्या के संपन्न हो गई। लेकिन भारत का परीक्षा-संकट केवल पेपर-लीक तक सीमित नहीं है। इसे एक प्रणालीगत विफलता के रूप में पहचाना जाना चाहिए। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने 12 मई को नीट-यूजी को रद्द कर दिया​ था, जबकि उससे कुछ दिन पहले ही 22.7 लाख अभ्यर्थी इसमें शामिल हो चुके थे। दो वर्षों में यह इस तरह की दूसरी घटना थी। परीक्षाओं को रद्द करना भले ही कभी-कभी आवश्यक हो, लेकिन अंततः इससे वो ईमानदार छात्र ही दंडित होते हैं, जिन्होंने नियमों का पालन किया था। भारत आज भी दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से कुछ को ऐसे तंत्र के माध्यम से संचालित करने की कोशिश कर रहा है, जिसे वर्तमान समय के पैमाने, जटिलता और प्रोत्साहनों के अनुरूप अभी तक अपडेट नहीं किया गया है। यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे तात्कालिक निगरानी के उपायों से हैंडल किया जा सके। भारत में जिस पैमाने पर परीक्षाएं होती हैं, उसकी दुनिया में दूसरी मिसाल नहीं। एनटीए ने 2018 से 2023 के बीच 244 परीक्षाएं आयोजित कीं। इस अवधि में अभ्यर्थियों की संख्या लगभग दोगुनी होकर करीब 67 लाख से बढ़कर लगभग 122 लाख हो गई। केवल नीट में ही एक बार में 22-24 लाख अभ्यर्थी शामिल होते हैं। 2024 में चीन की गाओकाओ परीक्षा के लिए 134.2 लाख पंजीकृत अभ्यर्थी थे, जबकि दक्षिण कोरिया की सीएसएटी परीक्षा में 2026 के लिए लगभग 5.54 लाख आवेदक थे। भारत की नीट परीक्षा गाओकाओ से तो छोटी है, लेकिन कोरिया की एकमात्र राष्ट्रीय परीक्षा से कहीं बड़ी है। और चीन या कोरिया के विपरीत, भारत प्रतिवर्ष एक ही केंद्रीय रूप से संचालित परीक्षा आयोजित नहीं करता। हमारी परीक्षा-व्यवस्था लगातार चलने वाली, संघीय, बहुभाषी और व्यापक है। इसीलिए चीन या कोरिया का मॉडल हमारे यहां कारगर नहीं होगा। चीन और कोरिया एक निर्णायक परीक्षा के इर्द-गिर्द राज्य की पूरी मशीनरी को संगठित कर सकते हैं। भारत साल में दस बार पूरे राज्यतंत्र को परीक्षा सुरक्षा-व्यवस्था में नहीं बदल सकता। हमें भारतीय पैमाने के अनुरूप एक ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो मजबूत, मॉड्यूलर, तकनीक-समर्थित, संचालन में विकेंद्रीकृत, लेकिन मानकों में केंद्रीकृत हो। राष्ट्रीय परीक्षाओं में 2024 के विवादों के बाद डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित उच्च-स्तरीय समिति ने ठीक इसी चुनौती को पहचाना था। उसकी रिपोर्ट में एनटीए के माध्यम से परीक्षाओं के पारदर्शी, सुचारु और निष्पक्ष संचालन के लिए व्यापक सुधार ढांचे का प्रस्ताव रखा गया। संदेश स्पष्ट था : हमें परीक्षाओं के लिए एक नई प्रणाली की आवश्यकता है। पहला सुधार संस्थागत होना चाहिए। तकनीक किसी कमजोर संस्था की भरपाई नहीं कर सकती; हद से हद वह केवल प्रणाली की कमजोरियों को डिजिटल रूप ही दे सकती है। भारत को एनटीए का पुनर्निर्माण एक स्थायी, पेशेवर और मिशन-आधारित मूल्यांकन संस्था के रूप में करना होगा, जिसमें साइकोमेट्रिक्स, साइबर सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, डेटा विश्लेषण, पेपर-सेटिंग, वेंडर प्रबंधन और कानून प्रवर्तन जैसे क्षेत्रों में गहरी आंतरिक क्षमता हो। एक सीमित क्षमता वाली एजेंसी- जो अत्यधिक प्राइवेट वेंडर्स, अस्थायी निरीक्षकों और आउटसोर्स की गई प्रक्रियाओं पर निर्भर हो- भारत की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं का भार नहीं उठा सकती। दूसरा सुधार पेपर-सेटिंग की प्रक्रिया में होना चाहिए। सबसे सुरक्षित प्रश्नपत्र वह होता है, जिसे कोई एक व्यक्ति पूरी तरह कभी देख न सके। यही यूपीएससी और जेईई एडवांस्ड की बड़ी ताकत है : बड़े व गुमनाम पेनल, अलग-अलग स्तरों में विभाजित व्यवस्था, कई समानांतर पेपर सेट, रैंडमाइजेशन और प्राइवेट इंटरमीडियरीज़ के लिए न्यूनतम पहुंच। यह ढांचा सुनिश्चित करता है कि यदि व्यवस्था की कोई कड़ी प्रभावित भी हो जाए, तो पूरी परीक्षा प्रभावित न हो। तीसरा सुधार तकनीकी होना चाहिए, लेकिन तकनीक को व्यवस्था के अनुरूप काम करना चाहिए। भविष्य बड़े और लगातार अपडेट किए जाने वाले प्रश्न बैंक, कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं और समय के साथ एडाप्टिव टेस्टिंग में है। हमें डिजिटल परीक्षा ढांचा भी तैयार करना होगा। राधाकृष्णन समिति के 1,000 केंद्रीय विद्यालयों और अन्य विश्वसनीय सार्वजनिक संस्थानों को सुरक्षित परीक्षा केंद्रों के रूप में विकसित करने के प्रस्ताव को लागू किया जाना चाहिए। पहचान और निगरानी व्यवस्था को भी और मजबूत करना होगा। एआई का उपयोग भी फॉरेंसिक उपकरण के रूप में किया जा सकता है। किसी एक सुबह पर छात्र के भाग्य का दारोमदार नहीं हो सकता। मल्टी-स्टेज परीक्षाएं, अधिक अवसर, सामान्यीकृत स्कोरिंग और पारदर्शी शिकायत निवारण व्यवस्था जरूरी है। एक ही प्रश्नपत्र की ब्लैक-मार्केट वैल्यू को घटाकर हम सिस्टम को बेहतर बना सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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