अमिताभ कांत का कॉलम:  होर्मुज संकट ने ऊर्जा सुरक्षा का एक अवसर भी दिया है
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अमिताभ कांत का कॉलम: होर्मुज संकट ने ऊर्जा सुरक्षा का एक अवसर भी दिया है

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7 घंटे पहले

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अमिताभ कांत नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा - Dainik Bhaskar

अमिताभ कांत नीति आयोग के पूर्व सीईओ और भारत के पूर्व जी-20 शेरपा

होर्मुज स्ट्रेट बंद है और वैश्विक सप्लाई ठप हो चुकी है। ऐसे में प्रधानमंत्री की सलाह महज संयम की अस्थायी अपील नहीं है। यह संकेत है कि ऊर्जा-सुरक्षा भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है। जब नागरिकों को सार्वजनिक परिवहन साधनों से चलने, ईंधन की खपत कम करने, रेल से माल ढुलाई, अनावश्यक विदेशी यात्राएं सीमित करने की सलाह दी जा रही है तो संदेश साफ समझ आना चाहिए। एक सुदूर, संकरे समुद्री मार्ग में व्यवधान का भारत में परिवारों के बजट, फैक्ट्रियों की लागत, परिवहन व्यवस्था और विदेशी मुद्रा तक पर गहरा असर पड़ा है।

हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में हैं और हमारी ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ती रहेगी। फिर भी हम जीवाश्म ईंधन के आयात पर अधिक निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल और लगभग 50% गैस आयात करता है। मौजूदा संकट से पहले भी हमारा जीवाश्म ईंधन आयात बिल लगभग 180 अरब डॉलर था। ति कर चुका है।

गैर-जीवाश्म ईंधन में हमारी स्थापित क्षमता 283 गीगावाट पार कर चुकी है। इसमें 150 गीगावाट से अधिक सौर और 56 गीगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। 2030 की समयसीमा से पहले ही हमने बिजली की कुल स्थापित क्षमता में 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है। देश में 2.8 करोड़ घर विद्युतीकृत हो चुके हैं और 10 करोड़ से अधिक परिवारों को खाना पकाने का स्वच्छ ईंधन मिल चुका है। ये बहुत बड़े बदलाव हैं।

आर्थिक समीकरण भी बदल चुके हैं। भारत में सौर ऊर्जा अब बिजली उत्पादन के सबसे सस्ते स्रोतों में शामिल है। ग्रीन अमोनिया की नीलामियों में भी भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर से कहीं कम कीमतें सामने आई हैं। यह प्रगति बताती है कि स्वच्छ तकनीकें अब भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था में मजबूती से पैठ बना चुकी हैं।

लेकिन अगला चरण कहीं अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए। हमें 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म लक्ष्य के परे सोचने की जरूरत है। 2025 में चीन ने एक साल में ही अपनी रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में 400 गीगावाट से अधिक का विस्तार किया, जबकि हम 56 गीगावाट ही जोड़ पाए। जलवायु के नजरिए से भारत को विशेष लाभ प्राप्त है और अगर हमारा उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा है तो भारत को 1500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य तय करना चाहिए। यह महत्वाकांक्षी जरूर होगा, लेकिन नामुमकिन नहीं। यह लक्ष्य बाजारों, निर्माताओं, राज्यों और निवेशकों को भी साफ संकेत देगा कि भारत अगले दशक के ऊर्जा बदलावों को पांच वर्षों में हासिल करने का इरादा रखता है। इस महत्वाकांक्षा के बिना भारत के लिए डेटा सेंटर संचालित कर पाना और एआई की अगली लहर का नेतृत्व कर पाना संभव नहीं होगा। क्योंकि नए डेटा सेंटरों को स्वच्छ ऊर्जा से ही चलाना होगा।

अकेले उत्पादन क्षमता बढ़ोतरी से यह महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। यदि हम ग्रिड निर्माण में पिछड़े तो 1500 गीगावाट का स्वच्छ ऊर्जा तंत्र नहीं बना पाएंगे। उत्पादन क्षमता को बिजली निकासी व्यवस्था, ग्रिड स्थिरता और मांग-आधारित तत्परता के साथ कदमताल करनी होगी।

रिन्यूएबल एनर्जी के लिहाज से समृद्ध क्षेत्रों में ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार तेजी से करना होगा। यह युद्ध स्तर पर होना चाहिए और इस प्रयास में डिजिटाइजेशन की प्रमुख भूमिका होगी। फिर स्टोरेज भी उतना ही अहम है। इसी के जरिए रुक-रुककर मिलने वाली रिन्यूएबल एनर्जी चौबीसों घंटे की भरोसेमंद बिजली में बदलती है। रिन्यूएबल एनर्जी के हर बड़े टेंडर में भरोसेमंद और डिस्पैचेबल बिजली सप्लाई के प्रावधान होने चाहिए।

ऊर्जा के मामले में भारत की अगली छलांग केवल क्षमता बढ़ाने से तय नहीं होगी, बल्कि ऐसे तंत्र के निर्माण से होगी, जो रिन्यूएबल एनर्जी को भरोसेमंद, सस्ता, सुरक्षित बनाता हो। मौजूदा संकट ने एक अवसर दिया है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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