![]()
‘आपातकाल’ शब्द अपने आप में एक गहरी बेचैनी का भाव उत्पन्न करता है। इस दौरान प्रायः किसी कथित बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पूर्व स्थापित मानदंडों और प्रक्रियाओं को निलंबित कर दिया जाता है। इतिहास के प्रत्येक कालखंड में मानवता ने किसी न किसी प्रकार की आपात-स्थिति का सामना किया है। फिर भी, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की राष्ट्रीय चेतना पर वर्ष 1975 में राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर लगाए गए ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ जितना गहरा प्रभाव किसी अन्य आपात-स्थिति ने नहीं डाला होगा। यह इतिहास का ऐसा काला अध्याय था, जिसे आज भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए चेतावनी के रूप में याद किया जाता है। आज संपूर्ण राष्ट्र ‘संविधान हत्या दिवस’ मना रहा है। देश में आपातकाल लागू किया जाना हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का अमिट कलंक बना हुआ है। इतिहास के इस अंधकारमय और पीड़ादायक कालखंड को 51 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, किंतु आपातकाल का वह समय भारत के जन-मन को आज भी विचलित करता है। लेकिन यह भारत के नागरिकों को लोकतांत्रिक व्यवस्था का सजग प्रहरी बने रहने के लिए दृढ़ संकल्पित भी करता है। वर्ष 1975 में आपातकाल लागू कर इंदिरा गांधी सरकार ने संवैधानिक भावना की अवहेलना करते हुए देश में नैतिक शासन-व्यवस्था के ताने-बाने को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में हुई अनियमितताएं, उसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला तथा इंदिरा गांधी पर सत्ता से हटने के लिए बढ़ता जन-दबाव भारत के लिए कोई ‘आंतरिक अशांति’ उत्पन्न करने वाले कारण नहीं थे। आपातकाल लागू करने से पहले के घटनाक्रम इंदिया गांधी की लोकतंत्र-विरोधी मानसिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित चुनाव से संबंधित मामले में 19 मार्च 1975 में अदालत के समक्ष आकर गवाही देने वाली वे पहली भारतीय प्रधानमंत्री थीं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 12 जून 1975 को सुनाया गया अंतिम निर्णय दूरगामी परिणामों वाला था। इस निर्णय द्वारा श्रीमती गांधी के चुनाव को अमान्य एवं उन्हें 6 वर्षों के लिए किसी भी निर्वाचित पद को धारण करने से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इसके बाद 24 जून को उच्चतम न्यायालय ने उनकी अपील की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी। इससे उन्हें संसद में उपस्थित होने की अनुमति तो मिल गई, किंतु मामले का फैसला उच्च पीठ द्वारा होने तक उन्हें मतदान करने या वेतन प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसी बीच, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विशाल जनसभा ने जनता का दबाव और बढ़ा दिया तथा उनके इस्तीफे की मांग राजनीतिक हलकों में गूंज उठी। इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लागू करने का फैसला लिया। 25 जून की मध्य रात्रि को उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को मंत्रिमंडल की पूर्व सहमति के बिना आपातकाल घोषित करने की सलाह दी। यह सूचना सरकारी लेटरहेड के स्थान पर सादे कागज पर दी थी। अतीत के घावों को याद करते हुए सरकार ने 11 जुलाई 2024 को जारी गजट अधिसूचना के माध्यम से 25 जून का दिन ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाए जाने की घोषणा की। यह उन सभी के योगदान को याद करने और उन्हें सम्मानित करने का दिवस है, जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए दृढ़ता से खड़े रहे। यह दिन हमें संविधान में निहित मूल्यों की रक्षा के महत्व की भी याद दिलाता है।
Source link








