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- Aarti Jerath’s Column: Presenting A Positive Image Of The Country To The World Is Also Our Duty
6 घंटे पहले
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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार
किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीय पर्यटकों के बारे में सर्च कर लीजिए, विदेश यात्राओं के दौरान उनके व्यवहार, या कहें दुर्व्यवहार के अनेक वीडियो सामने आ जाएंगे। एक समूह चीन की दीवार पर उत्सवी परिधान पहनकर गरबा कर रहा है।
दूसरा वियतनाम में हनोई की प्रसिद्ध ट्रेन स्ट्रीट पर शाहरुख खान के गीत ‘छैंया छैंया’ पर नाच रहा है। एक ग्रुप वियतनाम के ही एक एयरपोर्ट में रनवे के समीप की सड़क पर डांस कर रहा है, जिससे वहां का सुरक्षा स्टाफ परेशान नजर आता है। जबकि एक अन्य, अर्जेंटीना और ब्राजील की सीमा पर स्थित इगुआजु फॉल्स की बोट सफारी करते हुए ‘इंडिया, इंडिया’ के नारे लगा रहा है।
इससे पहले उन्हीं लोगों ने नाव में चढ़ते वक्त कतार तोड़ने की कोशिश में धक्का-मुक्की भी की थी। पेरिस, लंदन, बैंकॉक, बाली तक ऐसे कई उदाहरण आपको दिख जाएंगे। विरले ही ऐसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बचे होंगे, जहां भारतीय पर्यटकों ने व्यवस्था में खलल न डाला हो। एक वक्त था, जब विदेशों में अपने अक्खड़ रवैये के कारण अमेरिकी पर्यटकों को ‘द अग्ली अमेरिकन’ कहा जाने लगा था।
लगता है भारतीयों पर भी वैसा ही ठप्पा लगने जा रहा है, क्योंकि उनमें से कई स्थानीय भावनाओं की अनदेखी करते पाए जा रहे हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि सभी भारतीय पर्यटक ऐसा दुर्व्यवहार करते हैं। असल में तो यात्रा-शिष्टाचार के उल्लंघन को लेकर सोशल मीडिया पर जो नाराजगी दिखाई देती है, वह ज्यादातर भारतीय ही जताते हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि मुट्ठीभर लोगों के बिगड़ैल रवैये से न केवल विदेशों में भारत की छवि बिगड़ती है, बल्कि उनके लिए भी माहौल खराब होता है।
लेकिन उनके चिंता जताने के बावजूद भारतीय पर्यटकों को लेकर ऐसी कहानियां सामने आती रहती हैं कि वे कीमतों को लेकर उग्र होकर मोलभाव करते हैं, वेटरों और दुकानदारों से रूखेपन से बात करते हैं और यहां तक कि होटलों से साबुन, तौलिया जैसी चीजें भी चुरा लाते हैं। हाल ही में उद्योगपति हर्ष गोयनका ने ‘एक्स’ पर अपने साथ हुई ऐसी शर्मनाक घटना का जिक्र करते हुए लिखा कि ऐसे व्यवहार के कारण ‘ब्रांड इंडिया’ को कैसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।
उन्होंने बताया कि स्विट्जरलैंड के पर्यटन स्थल ग्स्टाड के एक होटल में भारतीय पर्यटकों के लिए विशेष नियमों की सूची देखकर वे हैरान रह गए। होटल के हर कमरे में लगे नोटिस में भारतीयों के लिए चेतावनी थी कि वे मुफ्त ब्रेकफास्ट बुफे से खाना बाहर न ले जाएं। सिर्फ उपलब्ध कराई गई कटलरी ही इस्तेमाल करें और बालकनी तथा गलियारों में शोर न मचाएं।
उन्होंने एक और घटना बताई कि एक भारतीय कारोबारी किसी साल दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में गए और रेस्तरां में इतना तेज पंजाबी म्यूजिक बजाने लगे कि पूरा शहर सुन ले। वे इसे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रदर्शन बता रहे थे। असल बात यह है कि देश में रहकर सिविक सेंस की जो कमी हम प्रदर्शित करते हैं, वो अब विदेश में भी नजर आने लगी है।
रोजाना हम देखते हैं कि हवाई जहाजों और रेस्तरां में बच्चों को उछल-कूद मचाने दिया जाता है। माता-पिता दूसरों को हो रही परेशानी से बेखबर बैठे रहते हैं। लोग सड़क पर चॉकलेट के रैपर और चिप्स के खाली पैकेट फेंक देते हैं। सोमवार को किसी सार्वजनिक पार्क में जाइए, जहां परिवारों ने रविवार को पिकनिक मनाई हो। जगह-जगह कागज की प्लेटें, गिलास और जूठन तक बिखरी होती है, जबकि वहां बाकायदा कूड़ेदान लगे होते हैं। कई देशों में, खासकर विकसित देशों में, बुनियादी सिविक सेंस स्कूलों से ही सिखाया जाता है और घरों में उसका पालन कराया जाता है।
लेकिन लगता है कि शायद हमने अच्छे नागरिक बनने के महत्व को भुला दिया है। थाईलैंड ने अवांछित पर्यटकों को छांटने के लिए वीसा नीति में बदलाव किया है। उसने 93 देशों के लिए वीसा-मुक्त प्रवेश समाप्त कर दिया है और भारत भी उनमें शामिल है, जबकि भारत से सर्वाधिक पर्यटक थाईलैंड जाते हैं। आज भारतीयों की वैश्विक मौजूदगी बढ़ी है। पर इसका यह भी मतलब है कि हमारे पर्यटकों की निगरानी अधिक होती है। ऐसे में हमारा फर्ज बनता है कि हम अपनी और अपने देश की बेहतर छवि पेश करें। आखिरकार, पर्यटक भी राजनयिकों की भांति ही भारत के प्रतिनिधि हैं।
- आज भारतीयों की वैश्विक मौजूदगी बढ़ी है। इसका यह भी मतलब है कि हमारे पर्यटकों की निगरानी अधिक होती है। ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम देश की बेहतर छवि पेश करें। पर्यटक भी राजनयिकों की भांति भारत के प्रतिनिधि हैं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)









