पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  मितव्ययी धन का मूल्य देखता है तो कंजूस कीमत देखता है
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: मितव्ययी धन का मूल्य देखता है तो कंजूस कीमत देखता है

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  • Pt. Vijayshankar Mehta’s Column: The Frugal Person Sees The Value Of Money, While The Miser Sees The Price.

4 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

मितव्ययी और कंजूस होने में फर्क है। यह वही अंतर है, जो एक समझदार और एक कृपण में होता है। मितव्ययी धन के पीछे के मूल्य को देखता है, कंजूस धन में केवल कीमत देखता है। मितव्ययी समझदारी से खर्च करता है, कंजूस सुअवसरों पर भी खर्च नहीं करता।

अब एक कठिन समय सारी दुनिया देखेगी तो हमारा देश भी देखेगा। इस समय देशवासियों को मितव्ययी होना है, कंजूस नहीं बनना है। और मितव्ययी होने के कई स्वरूप हैं। जैसे, नॉइज़ बैरियर- यानी शोर से बचें-बचाएं। ग्रीन कॉरिडोर- पर्यावरण की रक्षा करें। ईवी का उपयोग करें ताकि बिजली की खपत कम हो। हमें कई स्तरों पर काम करना पड़ेगा।

अब मामला केवल धन से नहीं जुड़ा, जीवनशैली से जुड़ गया है। इस समय हर मनुष्य के दिमाग में कई विचार आ रहे होंगे। अब क्या होगा? कैसे निपटारा करेंगे? और हर विचार में तरंगें होती हैं। तो जैसे ही विचार अंदर आता है, तरंगें अपना काम करने लगती हैं। फिर ये तरंगें हमको कम्पित करती हैं। ये ही अशांति का कारण बन जाता है।

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