4 घंटे पहले
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आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार
पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए नरसंहार की गहरी साम्प्रदायिक प्रकृति भारत के प्रति पाकिस्तान के छद्म युद्ध में एक नए चरण का संकेत देने वाली थी। अतीत में पाकिस्तान की शह पर होने वाले आतंकवादी हमलों में सुरक्षा बलों और सैन्य शिविरों को निशाना बनाया जाता था, लेकिन इस बार आतंकवादियों ने नागरिकों को निशाना बनाया।
उनमें भी पर्यटकों को, जो कश्मीर की अर्थव्यवस्था के बदलते चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उन्हें भी धर्म के आधार पर। पाकिस्तान की रणनीति में बदलाव का पहला संकेत तो खुद सेना प्रमुख असीम मुनीर के हवाले से मिल गया था, जब उन्होंने पहलगाम नरसंहार से पहले और बाद में दो-राष्ट्र सिद्धांत को सामने रखते हुए कहा कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि वे जीवन के हर पहलू में अलग हैं।
पहलगाम हत्याकांड को जैसा सांप्रदायिक ट्विस्ट मिला है, उसे भी मुनीर की टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। हाल के सालों में पाकिस्तान के किसी भी सेना प्रमुख ने कश्मीर पर पाकिस्तान के दावों को सही ठहराने के लिए दो-राष्ट्र सिद्धांत का सहारा नहीं लिया है।
मोदी सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान के लिए नई रेड लाइंस खींची हैं। यह देखना बाकी है कि यह ‘न्यू नॉर्मल’ भविष्य के आतंकवादी हमलों के खिलाफ कारगर होता है या नहीं। अतीत के अनुभव तो यही बताते हैं कि पाकिस्तान हर बार नए जोश के साथ जवाबी हमले करता है।
चिंता की बात यह है कि मुनीर की मानसिकता हमारे लिए नई चुनौतियां पेश करती है। समय ही बताएगा कि उनकी योजनाएं क्या हैं लेकिन यह भी हो सकता है कि वे अपनी घरेलू विफलताओं को छुपाने के लिए इस छद्म युद्ध के दायरे को बढ़ा रहे हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान की ओर से भविष्य में होने वाले किसी भी प्रकार के हमले के जवाब में कड़ी सैन्य प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है। लेकिन साथ ही हमें धारणाओं की लड़ाई भी लड़नी है। नैरेटिव मजबूत बनाए रखने के लिए हमारे लिए देश में सांप्रदायिक तनाव को कम करना और सामाजिक संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
किसी को भी- खासकर मुनीर को- हमारे सामने दो-राष्ट्र सिद्धांत का दिखावा करने का मौका नहीं मिलना चाहिए। पहलगाम में आतंकवाद के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया स्पष्ट और तीखी थी। उसने ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया ब्रीफिंग का नेतृत्व करने के लिए विदेश सचिव विक्रम मिस्री के साथ दो भिन्न समुदायों की महिला सैन्य अधिकारियों को उतारकर हमारे बहुलतावाद को प्रदर्शित किया। यह भारत की ओर से एक शक्तिशाली स्टैंड था।
केंद्र सरकार ने बहुलता के संदेश को उन सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों के माध्यम से भी आगे बढ़ाया, जिन्हें पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर भारत का पक्ष रखने के लिए विदेश भेजा गया है। प्रतिनिधिमंडल में एक मुस्लिम नेता और एक सिख चेहरा है।
ईसाई समुदाय और पूर्वोत्तर के प्रतिनिधि भी हैं। दुर्भाग्य से, भाजपा का ही एक वर्ग सरकार के संदेश के महत्व को पूरी तरह से समझ नहीं पाया है। सुर्खियां बटोरने के सस्ते हथकंडे अपनाकर उसने अपनी ही सरकार को लज्जित किया है। मध्य प्रदेश में भाजपा के राज्यमंत्री विजय शाह ने कर्नल कुरैशी पर सांप्रदायिक बयानबाजी करते हुए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। इसके कुछ दिन बाद हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया ने जमीनी हकीकत की मांग करने वाले एक साधारण सोशल मीडिया पोस्ट के लिए अशोका विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। सरकार ने 17 मई को अंतरराष्ट्रीय आउटरीच के लिए प्रतिनिधियों की पूरी सूची की घोषणा की, अगले ही दिन हरियाणा पुलिस ने महमूदाबाद को गिरफ्तार कर लिया।
इस तरह की घटनाएं दुनिया में हमारे नैरेटिव को बिगाड़ देती हैं। यह एक मुश्किल समय है और संतुलित प्रतिक्रिया की मांग करता है। भारत-पाकिस्तान संघर्ष अब युद्ध के मैदान से निकलकर परस्पर-नैरेटिव, कुशल कूटनीति और जनसंपर्क अभ्यासों के सूक्ष्म क्षेत्र में चला गया है।
ऐसे में विजय शाह और रेणु भाटिया जैसे लोग हमारे साथ न्याय नहीं करते। हमें नाप-तौलकर बोलने और भारत का पक्ष बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रखने वाले लोगों की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मुख्यमंत्रियों की एक बैठक में एनडीए सांसदों को चेतावनी दी कि वे इस समय अनावश्यक और भड़काऊ बयान न दें। उम्मीद करें कि यह संदेश जवाबदेहों तक पहुंचेगा।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष अब युद्ध के मैदान से निकलकर परस्पर-नैरेटिव, कुशल कूटनीति और जनसंपर्क अभ्यासों के सूक्ष्म क्षेत्र में चला गया है। हमें भारत का पक्ष बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रखने वाले लोगों की जरूरत है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं।)








