ऋचा रॉय और अरूंधती काटजू का कॉलम:  एआई में आगे बढ़ने के लिए विदेशी डेटा सेंटरों को छूट कितनी उचित?
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ऋचा रॉय और अरूंधती काटजू का कॉलम: एआई में आगे बढ़ने के लिए विदेशी डेटा सेंटरों को छूट कितनी उचित?

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भारत एआई इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका एक जरिया विदेशी कंपनियों के लिए भारत में डेटा सेंटर की स्थापना को आसान करना भी है। डेटा सेंटर ऐसी कंप्यूटर सिस्टम्स फेसेलिटी हैं, जो डेटा स्टोर करने में इस्तेमाल होती हैं और क्लाउड स्टोरेज से लेकर एआई तक हर चीज को सपोर्ट करती हैं। इस साल के बजट में विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए 21 साल की टैक्स छूट दी गई है। केंद्र की इस टैक्स छूट के अलावा, राज्य सरकारों ने भी विदेशी डेटा सेंटरों को कई तरह के प्रोत्साहन दिए हैं। लेकिन अमेरिका में देखें तो इन्हीं कंपनियों के डेटा सेंटरों में बड़े निवेश के प्रस्ताव स्थानीय विरोध के कारण वापस ले लिए गए हैं। तब सवाल उठता है कि एआई इकोनॉमी में प्रवेश करने के लिए विदेशी डेटा सेंटरों की मेजबानी करना क्या भारत के लिए सही रणनीति है? पहले तो हम देखें कि इस टैक्स छूट को लेने वाली विदेशी कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की कोई शर्त नहीं रखी गई है और न ही भारत में एआई मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी क्षमता बढ़ाने के कोई प्रावधान हैं। मौजूदा भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क के तहत भारत ने वादा किया है कि वह तकनीकी समेत 500 अरब डॉलर तक की अमेरिकी वस्तुएं और सेवाएं खरीदेगा। अमेरिकी सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी उपकरणों पर आयात प्रतिबंध भी हटाएगा। ऐसे में बहुत संभावना है कि भारत में डेटा सेंटर चलाने वाली कंपनियां घरेलू क्षमता विकसित करने के बजाय अमेरिका से उपकरणों का आयात करेंगी। गौरतलब यह भी है कि डेटा सेंटर चलाने वाली भारतीय कंपनियों को इस टैक्स छूट का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि यह केवल विदेशी कंपनियों के लिए है। इन हालात में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बगैर डेटा सेंटर इनोवेशन के इंजन नहीं, महज गोदाम बनकर रह जाते हैं। इस टैक्स छूट के लिए जरूरी है कि इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय डेटा सेंटरों के लिए एक योजना लाए। इसमें नॉलेज ट्रांसफर और भारतीय कंपनियों के लिए सीधे प्रोत्साहन का प्रावधान शामिल हो। इनके बिना भारत इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराने तक ही सीमित रहेगा, एआई क्षमता विकसित नहीं कर पाएगा। दूसरी बात, डेटा सेंटरों में अत्यधिक बिजली खपत होती है और उन्हें कूलिंग के लिए पानी की बहुत अधिक जरूरत होती है। भारत जैसे देश में इनके लिए नियामक प्रावधान की जरूरत है, जहां हीटवेव और जल संकट पहले ही जनजीवन को प्रभावित कर रहे हैं। आम तौर पर तर्क दिया जाता है कि भारत को इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरूरत है और पर्यावरण संबंधी ये चिंताएं तो पश्चिमी देशों की लग्जरी हैं। लेकिन यह तर्क भारत में जल संकट के खतरे को नजरअंदाज करता है। भारत में दुनिया की 18% आबादी रहती है, लेकिन जल संसाधन केवल 4% हैं। भारत के मौजूदा 50 डेटा सेंटर पहले ही ऐसे क्षेत्रों में हैं, जहां पानी की भारी किल्लत है। विदेशी डेटा को भारत में रखने के भू-राजनीतिक जोखिम भी हैं। अमेरिका-ईरान युद्ध में ईरान ने यूएई और बहरीन में एडब्ल्यूएस डेटा सेंटरों पर हमला किया। ईरान ने जिन लक्ष्यों की सूची जारी की, उनमें भी प्रमुख अमेरिकी टेक कंपनियों के डेटा सेंटर शामिल थे और उन्हें ‘एनिमी टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर’ के तौर पर वर्गीकृत किया गया था। डेटा सम्प्रभुता का सिद्धांत भी कहता है कि डिजिटल डेटा उसी देश के कानूनों या न्यायिक क्षेत्र के अधीन होता है, जहां वह भौतिक रूप से उत्पन्न और स्टोर होता है। बजट में भी प्रावधान है कि विदेशी कंपनी ऐसे ‘स्पेसिफाइड डेटा सेंटर’ के माध्यम से काम करे, जो भारतीय स्वामित्व में हो।
(ये लेखिकाओं के अपने विचार हैं)



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