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आज के दौर में ‘वायरल’ होना आम बात है, पर एक बेटे के लिए इसका अर्थ तब बदल गया जब उसके 89 साल के पिता ने उसे ‘वायरस’ कह दिया। यह सिर्फ शब्द की गलती नहीं थी, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच के उस फासले की कहानी थी, जिसे पाटने में बरसों लग गए। अमेरिकी लेखक डेविड लेविंसन कहते हैं,‘मुझे कभी पिता का प्यार सीधे नहीं मिला, नियमों से मिलता था, या जरूरतें पूरी करने से। मां की मौत के बाद तो हमारी बातचीत बंद ही हो गई।’ क्यों था ये अबोलापन और कैसे मिटी दूरी, जानिए… काफी दिनों बाद मैं पापा से मिलने पहुंचा। हर मुलाकात की तरह मन में नियम दोहराए, बात हल्की रखना। ज्यादा सुधारना नहीं। भावनाओं की उम्मीद न रखना। क्योंकि हमारे घर में प्यार भी अनुशासन के जरिए जताया जाता था। पापा को भावनाओं का प्रदर्शन पसंद नहीं था। जब मैं उदास होता, तो वे कहते ‘शांत हो जाओ’, और जब उत्साहित होता, तो कहते ‘ज्यादा हवा में मत उड़ो’। धीरे-धीरे मैंने उन्हीं की भाषा सीख ली और वह भाषा थी ‘खामोशी’। 2016 में मां की मौत के बाद यह खामोशी इतनी बढ़ी कि हमने पूरे एक दशक तक बात नहीं की। पापा ने रील देखी, बोले-तुम्हारे साथ शो भी देखना चाहता हूं इस बार की मुलाकात अलग थी। कुछ देर बैठने के बाद पापा बोले- तुम्हारे भाई ने बताया कि तुम ‘वायरस’ हो गए हो। दरअसल वे वायरल बोलना चाह रहे थे’। उनके लिए इंटरनेट आज भी ‘वेब’ ही था और सोशल मीडिया का तो उन्हें कुछ पता ही नहीं था। हिचकिचाते हुए मैंने अपना फोन निकाला और पापा को वह ‘रील’ दिखाई जिसमें मैं अमेरिकी शो के बारे में बात करते हुए रो रहा था। यह शो दो पुरुषों की दोस्ती से जुड़ा था। मुझे लगा पापा इसे ‘बकवास’ कहकर टाल देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। पापा ने पहली बार मेरी दुनिया में झांकने की कोशिश की। उन्होंने रील देखी और कहा,‘मैं तुम्हारे साथ यह शो भी देखना चाहता हूं।’ हम साथ बैठकर शो देखने लगे। पापा का सख्त चेहरा नरम पड़ने लगा। भावुक दृश्य आने पर उन्होंने कुर्सी का हत्था कसकर पकड़ लिया। मानो पहली बार मेरी भावनाओं व सच को गहराई से महसूस कर रहे हों। शो के बाद पापा ने कहा,‘मुझे नहीं पता था कि तुम्हारे मन पर इतना बोझ है।’ पहली बार उन्होंने मुझे ‘समस्या’ नहीं,‘इंसान’ की तरह देखा। जाते वक्त कहा… मुझे खुशी है तुम वायरल हुए, लोग तुम्हें सुन रहे हैं।’ मुझे इसी पहचान की तलाश थी।
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