एन. रघुरामन का कॉलम:  आपस में सुनने की आदत एक ब्रेकडाउन को ब्रेकथ्रू बनाती है
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एन. रघुरामन का कॉलम: आपस में सुनने की आदत एक ब्रेकडाउन को ब्रेकथ्रू बनाती है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कई दशक पहले की बात है, मेरे कजिन की शादी थी। हमारी पीढ़ी में यह पहली शादी थी। हम सब कजिन इतने उत्साहित थे कि मद्रास (अब चेन्नई) में इकट्ठा हुए और तैयारियों में जुट गए। लेकिन हमेशा हंसने और खुश रहने वाली कजिन, जिसकी पांच दिन बाद शादी थी, वह अचानक हमें अवॉइड करने लगी।

वह हमेशा अपने टेलीफोन वाले कमरे में बंद रहती। हम उसे सताने लगे कि उसे प्रेम हो गया है। वह गुस्से और शर्म की मिलीजुली-सी प्रतिक्रिया देती। लेकिन जब नानाजी ने आकर हमें एक अलग कहानी बताई तो लगा कि हम गलत समझ रहे थे।

उन्होंने कहा कि ‘वह पीड़ा में है, उसे परेशान मत करो। वह स्कूल की पुरानी ट्रॉफियां और फोटो एलबम छांट रही है। नए घर के लिए चंद सूटकेसों में उन्हें समेट नहीं पा रही। तुम्हें उसे परेशान नहीं करना चाहिए। जाओ और पैकिंग में उसकी मदद करो। इसके अलावा वह पैरेंट्स का साथ छूटने और एक नया पार्टनर पाने के बीच असमंजस में भी है।’

उस दिन नानाजी ने कमान संभाली। चूंकि मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ा था तो उन्होंने मुझसे साथ आने को कहा और उसके कमरे में जाकर उससे एक घंटे बातचीत की। उन्होंने खूबसूरती से समझाया कि वह अब अपने परिवार के दायरे में नए लोगों को शामिल करने वाली है।

उन्होंने कहा कि ‘किसी नए इंसान से शादी का मतलब माता-पिता को खोना नहीं, बल्कि एक प्रोटेक्टेड बेटी की भूमिका से बढ़कर ऐसी पार्टनर बनना है- जो दोनों परिवारों की देखभाल कर सके।’ उनकी आखिरी लाइन मैं कभी नहीं भूलूंगा।

उन्होंने कहा कि ‘शादी ​महज नए इंसान को पाना ही नहीं, बल्कि किसी पुराने इंसान को छोड़ना भी है। जैसे कि मैं, कोई और चीज या स्कूल के पुराने एलबम भी।’ वह उनसे लिपट कर रो पड़ी। उन्होंने पांच मिनट तक उसे खुलकर रोने दिया। उसी दिन मैंने अचानक-से उसमें बदलाव देखा। उसका सामान अब महज दो सूटकेसों में सिमट गया। उसी शाम हंसती, खिलखिलाती वो वापस आ गई थी।

यकीन मानिए, दशकों बाद नानाजी की वो गहरी सलाह मेरे काम आई, जब मैंने अपनी बेटी को उसी स्थिति में देखा। जब वह अपना ब्राइडल ट्रूजो चुन नहीं पा रही थी, तो मैंने उससे वही बात कही। वह अकसर अपनी मां के साथ बूटीक जाती, खूबसूरत लहंगे देखती और यह कहते हुए खाली हाथ लौट आती कि उसे ब्लू का सही शेड नहीं मिल रहा।

मुझे यह घटना तब याद आई, जब मैंने 10 फरवरी को ही जारी हुई किताब ‘लव्स लेबर : हाउ टु ब्रेक एंड मेक द बॉन्ड्स ऑफ लव’ में एक अच्छी शादी को लेकर बेहतरीन समझ को पढ़ा। इसमें प्रसिद्ध साइकोएनालिस्ट और लेखक स्टीफन ग्रोज ने ‘सोफी’ नाम के केन्द्रीय किरदार के इर्द-गिर्द प्यार, शादी, समझ और मिसअंडरस्टैंडिंग के अलग-अलग भावों पर बात की है। 40 से अधिक वर्षों तक मरीजों से हुई बातचीत के आधार पर वे यह बताते हैं कि जब हम सुनना सीखते हैं तो हमारी रिलेशनशिप हमें क्या सिखा सकती है।

चूंकि वे पश्चिमी दुनिया से हैं, जहां शादियां अस्थिरताओं से गुजर कर तलाक तक पहुंच जाती हैं, तो वे बताते हैं कि जब हम अपने पार्टनर को सुनना सीख जाते हैं तो रिलेशनशिप हमें क्या सिखाती है। मसलन, अचानक से जब पति को उसका काम आनंद देने लगे तो कपल्स के बीच फ्रिक्शन शुरू हो सकता है। उनकी सलाह है कि काम के प्रति इस नए प्यार पर झगड़ने के बजाय दोनों को बात करनी चाहिए, क्योंकि ‘रोमांस भी एक कार्य है और दोनों को इस पर भी कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।’

फंडा यह है कि लेबर ऑफ लव जीवन भर का काम है। जब हम एक-दूसरे को ज्यादा सुनते हैं, तो इसका फल और भी मीठा हो जाता है। कभी-कभी कमियां भी सुननी चाहिए, क्योंकि इससे कई बार नया रास्ता भी निकल आता है।

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