एन. रघुरामन का कॉलम:  इस डिजिटल दुनिया में हम कुछ नहीं, बस डेटा हैं!
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एन. रघुरामन का कॉलम: इस डिजिटल दुनिया में हम कुछ नहीं, बस डेटा हैं!

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6 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हमेशा की तरह इस गुरुवार को भी मैं अपनी दूधवाला फ्लाइट (अल सुबह) पर बोर्डिंग के लिए तैयार था। चूंकि उनींदा महसूस हो रहा था, तो कॉफी पीने का मन हुआ। कॉफी शॉप की कतार में मेरे आगे तीन लोग खड़े हुए थे। मैं अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।

दो लोगों ने यूपीआई से पैसा दिया और एक शख्स ने कार्ड से भुगतान किया। फिर मेरी बारी आई। मैंने एक कॉफी का ऑर्डर दिया। वह कॉफी बनाने के लिए चला गया क्योंकि मेरे पीछे कोई भी नहीं था। ज्यों ही कॉफी आई, मैंने उसे नकद पैसे दिए। पहले तो नकद पैसे लेने में उसने ना-नुकुर की।

काउंटर पर मौजूद शख्स ने पूछा, ‘क्या आपके पास यूपीआई नहीं है?’ जब मैंने कहा कि ऐसे छोटी खरीदारी के लिए मैं हमेशा कैश देना पसंद करता हूं। तो वो मेरी बात से संतुष्ट नहीं दिखा। उसने पूछा, कम से कम कार्ड से भुगतान कर दीजिए।

उसकी इस बात से मेरे अवचेतन मन में शक पैदा हुआ कि कुछ तो गड़बड़-झाला है। और मैंने फिर कहा, मैं बुजुर्ग आदमी हूं और मुझे कोई भी कार्ड नहीं देता। कृपया कैश ले लें। और फिर तब उसने बेमन से अपनी बिलिंग मशीन को कैश के लिए पंच किया और मुझसे पूछा “कृपया मुझे अपना बोर्डिंग पास दीजिए।”

तब मुझे जल्दी से समझ में आया कि उसे किसी बात की परवाह नहीं थी, वो बस मेरी निजी जानकारी चाह रहा था।सख्त लहजे में मैंने उससे पूछा, ‘भारत में कब से सिर्फ एक कप कॉफी खरीदने के लिए अपना नाम और पता देने की जरूरत पड़ने लगी? अगर कॉफी नहीं देना चाहते हो, तो कोई बात नहीं। लेकिन मैं अपनी कोई भी जानकारी देने से इंकार करता हूं।

मैं जानता हूं कि तुम या तुम्हारे मालिक इस तरह जमा किए हर नाम या डेटा को मोटी रकम लेकर बेच देते हो।’ इससे वह थोड़ा नरम पड़ गया और मुझे बिल देकर कहा, ‘सर, हम भला क्यों आपकी जानकारी लेना चाहेंगे, यह तो एयरपोर्ट अथॉरिटी हैं जो जोर देते हैं कि हमें हर सेल से ज्यादा से ज्यादा यात्री जानकारी जुटाने की आवश्यकता है।

इसलिए हम डिजिटल भुगतान पर जोर देते हैं, और हमें तो पता भी नहीं कि वे इस जानकारी का क्या करते हैं।’आधुनिक दौर में डिजिटल भुगतान एक नए अवतार में आ चुका है। सालों पहले मैं डिजिटल लेनदेन का विकल्प भी रखता था, क्योंकि इससे गरीब लोग किसी मकसद से पैसे जमा कर सकते थे।

एक बार मैंने पूर्वी दिल्ली के स्वास्थ्य विहार में मोहन चाट भंडार पर दो यूपीआई स्कैनिंग बोर्ड देखे। जब मैंने उससे पूछा कि वह दो यूपीआई बैंक डीटेल क्यों रखता है। तो उसने तपाक से जवाब दिया, ‘सर, बाएं हाथ वाले स्कैनर पर आने वाले पैसों को मैं इस्तेमाल नहीं करता।

वह पैसा मैं अपनी बहन की शादी के लिए जमा कर रहा हूं और यह तब तक चलता रहेगा, जब तक मेरी दोनों बहनों की शादी नहीं हो जाती। जबकि दाएं हाथ पर रखे स्कैनर पर आने वाले पैसों का इस्तेमाल मैं रोजमर्रा के खर्चों और बिजनेस में रोज लगने वाले सामान खरीदने के लिए करता हूं।’

उसकी बात सुनकर, मेरे साथ मौजूद मेरे मित्र ने उस यूपीआई पर बिल का भुगतान किया, जो उसने अपनी बहन की शादी के लिए खास रखा हुआ था। यह सुनकर मैं हिल गया क्योंकि कम से कम डिजिटल पेमेंट जैसी कोई एक चीज तो है, जिसने कमजोर आर्थिक वर्ग के लोगों को किसी उद्देश्य से बचत करने के लिए प्रेरित किया है।

मेरी हमेशा से इच्छा थी कि वापस जाकर उससे पूछूं कि “शादी कैसी रही और क्या इससे शादी के लिए बाहरी लोगों से पैसे उधार लेने की जरूरत पड़ी या नहीं।’ लेकिन मुझे वहां दोबारा जाने का मौका ही नहीं मिला।

हर छोटे से छोटे बिजनेस जैसे कि वह चाट भंडार वाला यूपीआई स्वीकार करते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वो हमारी जानकारी बेच ही रहे हों। पर एयरपोर्ट पर होने वाले ऐसे अनुभव हमें डरा रहे हैं।

फंडा यह है कि यह अलग बहस का मुद्दा है कि ग्राहकों की हर छोटी से छोटी जानकारी जुटाना कितना नैतिक है या नहीं। तब तक हम ये याद रखें कि हम केवल डेटा हैं, जो कहीं न कहीं इस्तेमाल होने के लिए हैं।

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