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- N. Raghuraman’s Column Empathy Works Faster Than Medicines In Treatment
10 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मुझे याद तक नहीं कि कितनी बार मैं झुकी-सी कमर और थकान के साथ नागपुर के हमारे पारिवारिक चिकित्सक स्वर्गीय डॉ. हरिदास की डिस्पेंसरी में गया था। लेकिन मुझे यह याद है कि इसमें से 90 फीसदी दफा मैं उसी डिस्पेंसरी से महज 20 मिनट में सीधी कमर के साथ मुस्कराता और कूदता हुआ बाहर निकला। सबसे पहले डॉक्टर मेरे सिर पर हाथ फेरते।
फिर मुझसे जीभ बाहर निकालने के लिए कहते और टॉर्च से इसके भीतर ऐसे देखते, जैसे मैं वहां कुछ छिपा रहा हूं। फिर वह अपने स्टेथोस्कोप से मेरे दिल और फेफड़ों की जांच करते। वह अपने साफ सुथरे मैनिक्योर किए हाथों से मेरी कलाई पकड़ते और उस समय में मुझसे कुछ ऐसी बातें करते रहते, जिनका मेरी बीमारी से कोई लेना-देना नहीं होता था। वह पूछते कि मैंने आज क्या खाया, कौन-सा विषय मेरे लिए बहुत कठिन है या सरल है। कौन-सा शिक्षक मुझे सबसे ज्यादा पसंद है इत्यादि।
अंतत: वो मुझे एक गोली देकर इसे अपने सामने ही खाने के लिए कहते, इस भरोसे के साथ कि ‘ये गोली तुम्हारे भीतर एक जादू करेगी। तुम यहां से 10 मिनट में ही नाचते-कूदते चले जाओगे।’ मैं कभी महसूस ही नहीं कर पाया कि मेरी बीमारी ठीक होने के जादू का कारण उनकी दी हुई गोली नहीं थी, बल्कि उनके जादुई शब्द और वो धैर्य था, जो वह मरीज की बात सुनने में देते थे।
यह बिल्कुल वही बात है, जो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस सोमवार एम्स गोरखपुर के पहले दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि ‘एक दयालु डॉक्टर सिर्फ दवाओं से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से भी उपचार करता है। सहानुभूति भरी देखभाल मरीज की रिकवरी को तेज करती है। एक डॉक्टर का धैर्य और समर्पण समाज के लिए एक आदर्श स्थापित करता है।’ उन्होंने चिकित्सा को महज एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सच्ची सेवा करार दिया।
राष्ट्रपति ने समारोह में ग्रेजुएशन कर रहे विद्यार्थियों को डिग्री और मेडल प्रदान किए और इस ऐतिहासिक आयोजन का हिस्सा बनने पर प्रसन्नता व्यक्त की। जैसे राष्ट्रपति ने जिक्र किया, वैसे सैंकड़ों चिकित्सक देश में हैं और उनमें से एक स्वर्गीय डॉ. वी बालासुब्रमणियम मुझे अच्छी तरह से याद हैं, जो ‘20 रुपए वाला डॉक्टर’ के नाम से मशहूर थे। एक ऐसा व्यक्ति जो गरीबों के लिए भगवान था। नवंबर 2016 में तमिलनाडु के कोयंबटूर में उनके घर और डिस्पेंसरी की गलियों में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था, जो अपने प्यारे ‘20 रुपए वाले डॉक्टर’ को श्रद्धांजलि देने आए थे।
उन्होंने कभी भी अपने मरीजों से उपचार के लिए 20 रुपए से अधिक फीस नहीं ली। पहले उन्होंने अपने मरीजों को महज 2 रुपए में परामर्श देना शुरु किया और फिर इसमें कई वर्षों तक बहुत मामूली बढ़ोतरी करते रहे। 2014 तक भी वह मरीज से महज 10 रुपए ही लेते थे। देश में आज भी उनके जैसे कई सारे चिकित्सक हैं।
डॉ. एस. एम. जियाउर्रहमान जब दिल्ली के एक बेहद प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में कार्यरत थे, तो उनके पास बिहार के खगड़िया से एक बेहद गरीब मरीज आया। जियाउर्रहमान स्वयं भी वहीं के रहने वाले थे। मरीज अपने उपचार के लिए करीब 1200 किलोमीटर की यात्रा कर उनके पास पहुंचा। इसी के कारण वह दिल्ली की अपनी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ कर अपने गृह नगर में सिर्फ 50 रुपए में मरीजों का इलाज करने के लिए प्रेरित हुए।
पिछले 35 वर्षों से बिहार के बरबीघा गांव के डॉ. रामानंद सिंह, पटना के डॉ.एजाज अली, आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले की डॉ. नूरी परवीन, कर्नाटक के डॉ. शंकरे गौड़ा इतनी कम फीस लेते हैं, जिसमें सड़क किनारे की गुमठी से एक कप चाय भी नहीं खरीदी जा सकती। लेकिन जब हम देश के सरकारी अस्पतालों के गलियारों में मदद के लिए गूंजती मरीजों की करुण पुकार सुनते हैं तो ये डॉक्टर चिकित्सकीय उपचार मुहैया कराते हैं।
फंडा यह है कि शायद ये चिकित्सक जानते हैं कि एक प्रगतिशील राष्ट्र के लिए स्वस्थ आबादी कितनी जरूरी है। और इसीलिए वे हमदर्दी से इतने भरे हुए हैं।








