6 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति सरकारी दफ्तर में यह पूछने जाता है कि उसे मिलने वाली सब्सिडी का क्या हुआ? या फिर, चूंकि वह किसी श्रेणी में है और किसी सरकारी योजना का लाभ लेने जाता है, लेकिन वहां बैठा अधिकारी बिना पलक झपकाए कहता है कि ‘हमारे रिकॉर्ड के मुताबिक आप तो कब के मर चुके, इसलिए कुछ नहीं मिलेगा।’
यह सुनकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? दूसरों का तो नहीं पता, लेकिन कर्नाटक के बेलगावी जिले के 53 साल के इरप्पा नागप्पा अब्बई जिस अधिकारी से मिलते हैं, उसके सामने चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ‘मैं मरा नहीं, जिंदा हूं।’ लेकिन कोई उनकी मदद नहीं कर रहा, क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में वे बहुत पहले ही मर चुके। आज या कल नहीं, बल्कि पूरे पांच साल पहले।
जी हां, संघर्ष की यह सच्ची कहानी कर्नाटक में बेलगावी जिले के सावदत्ती तालुक के सुतगट्टी में रहने वाले छोटी जोत के गन्ना किसान इरप्पा की है। यह स्थान कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से करीब 450 किलोमीटर दूर है। दिलचस्प यह है कि खुद इरप्पा को सिर्फ छह महीने पहले ही पता चला कि वे मर चुके हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड से 2021 में ही उनका नाम हट चुका है। सोच रहे हैं कि रिकॉर्ड में उनकी मौत कैसे हुई? तो घटनाक्रम इस प्रकार है।
2021 में इरप्पा के बेटे की मौत हो गई थी। बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र बनाते वक्त विलेज अकाउंटेंट ने गलती से पिता को भी मृतक के तौर पर दर्ज कर दिया। मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने वाले अधिकारी ने इरप्पा से पूछा भी था कि आपका मृतक से क्या संबंध है? इरप्पा के यह बताने के बावजूद कि वह उसका पिता है, अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया और पिता को भी मृत लिख दिया। कुछ ही दिन पहले बेटे को खोने वाले इरप्पा इस बात से बेखबर होकर दफ्तर से चले आए कि रिकॉर्ड में उसी दिन उनकी भी मृत्यु दर्ज हो चुकी।
2025 के मध्य में इरप्पा सरकारी ड्रिप इरिगेशन योजना में आवेदन संबंधी कुछ कागजात लेने जिले के लघु सिंचाई कार्यालय में गए। यदि आवेदन मंजूर होता तो उन्हें 3 लाख रुपए तक की सब्सिडी मिल सकती थी। सब्सिडी मिल भी जाती, लेकिन इरप्पा और आर्थिक सहायता के बीच एक आधिकारिक रिकॉर्ड बाधा बन गया, जिसमें लिखा था कि बेटे के साथ ही उनकी मौत भी 8 जुलाई 2021 को हो चुकी। इसी वजह से वह किसी भी सरकारी लाभ के लिए अयोग्य हो गए।
बीते पांच महीनों से यह किसान इरप्पा अपना मामला लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। लोगों से कह रहे हैं कि मुझे छूकर देखो, मैं जिंदा हूं- शायद ही किसी ने ऐसी विडंबना झेली हो। उन्हें आज भी यह अविश्वसनीय सा काम करना पड़ रहा है कि खुद को जिंदा साबित करें। बताएं कि वे चलते-फिरते भूत नहीं हैं।
उनके घर से तहसीलदार के दफ्तर तक का हर चक्कर करीब डेढ़ घंटे का और चिंता व अनिश्चितता से भरा होता है। वे इस साेच के साथ निकलते हैं कि पता नहीं जिंदा लौटेंगे या नहीं? मेरा मतलब वो नहीं, जो आप साेच रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या सरकार उनके जिंदा होने का तथ्य मानेगी।
हर बार अधिकारी उन्हें बताते हैं कि ऐसे सुधारों के लिए एक औपचारिक प्रक्रिया होती है और यह स्थानीय स्तर पर तुरंत नहीं हो सकता। तहसीलदार ने उनका आवेदन स्वीकार कर प्रक्रिया शुरू कर दी है। रिपोर्ट जिला सांख्यिकी कार्यालय और वहां से बेंगलुरु फॉरवर्ड की गई है। पूरी प्रक्रिया में एक और महीना लग सकता है।
फंडा यह है कि इस कटु अनुभव से हमें यह सीखने की जरूरत है कि यदि आप ऐसे गैर-जिम्मेदार सरकारी विभागों से कोई काम करवा रहे हैं तो सुनिश्चित कर लें कि आपकी दी गई और सिस्टम में दर्ज हुई हर जानकारी सटीक हो। वरना इरप्पा की तरह जूते घिसने के लिए तैयार हो जाएं।








