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- Sanjay Kumar’s Column: It Is Important To Assess The Impact Of Social Media On Voters.
4 घंटे पहले
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संजय कुमार, प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार
चुनाव-सर्वेक्षण मूल रूप से मौसमी होते हैं। चुनाव खत्म होते ही एग्जिट पोल आदि पर बहस खत्म हो जाती है और अगले चुनाव के वक्त ही लौटती है। इस साल अप्रैल-मई में असम, बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी में होने जा रहे चुनाव के चलते एग्जिट पोल पर चर्चा फिर से शुरू हो सकती है। लेकिन समस्या यह है कि अब वे पहले की तुलना में अधिक बार गलत साबित हो रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में सभी एग्जिट पोल औंधे मुंह आ पड़े थे। हरियाणा चुनाव में भी वे वोटरों का मन नहीं जान पाए। बिहार चुनाव में इनकी सटीकता का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा। अधिकतर ने एनडीए की जीत तो बताई, लेकिन इतने भारी बहुमत का अनुमान शायद ही कोई लगा पाया। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी एग्जिट पोल के अनुमान बहुत सटीक साबित नहीं हुए थे।
इसका कारण यह है कि ये सर्वेक्षण आज भी मतदान के जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्र जैसे पुराने और स्थिर फैक्टर्स पर टिके हैं। यह सही है कि ये पारंपरिक फैक्टर अब भी मतदाता की पसंद तय करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन एआई और सोशल मीडिया संचालित प्रचार अभियानों से पैदा होने वाले व्यक्तिगत प्रभाव भी इस पर असर डाल रहे हैं। एग्जिट पोल के लिए इस तरह के प्रभावों को मापना कठिन हो रहा है।
बीते कुछ चुनावों से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने एआई आधारित डेटा एनालिटिक्स में भारी निवेश किया है, ताकि मतदाताओं को छोटे-छोटे वर्गों में बांटकर उनके लिए अलग-अलग संदेश तैयार किए जा सकें। वोटरों के इस लक्षित मोबिलाइजेशन के लिए सियासी दल उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों, उपभोक्ता व्यवहार और ऑनलाइन डेटा का इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह माइक्रो-टारगेटिंग वोटरों को पहली बार के मतदाता, महत्वाकांक्षी उद्यमी या खास सरकारी योजना के लाभार्थी जैसे समूहों में बांट देती है। और इन वोटरों की पसंद जल्द अपनी परंपरागत वोटिंग से हटकर इन नए वर्गों में शिफ्ट हो जाती है। ऐसी माइक्रो लेवल टारगेटिंग और मोबिलाइजेशन को सर्वे के परंपरागत तरीकों से समझ पाना मुश्किल है, क्योंकि ये समूह व्यवहार आधारित डेटा से संचालित होते हैं।
सर्वे करने वाले आमतौर पर पारंपरिक तरीके से सैंपलिंग करते हैं तो उन मतदाता समूहों के रुझान और स्विंग का अंदाजा नहीं लगा पाते, जिन्हें सियासी दल बेहद आक्रामक तरीके से टारगेट कर रहे हैं। सर्वे के पारंपरिक तरीकों से शायद ही यह ठीक से आंका जा सकता है कि वोटर कौन-सा डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करते हैं, किस इंफ्लुएंसर्स को फॉलो करते हैं या कैसा सियासी कंटेंट देखते हैं।
और इसीलिए वे यह समझने में गच्चा खा जाते हैं कि ऑनलाइन जगत और वायरल ट्रेंड्स कैसे एक ही जाति और इलाके में भी लोगों की राय को विभाजित कर रहे हैं। बाद में जब विश्लेषक महज सामाजिक और जनसांख्यिकीय मानकों पर प्रतिक्रियाओं को तौलते हैं तो वे इन विभाजनों को हल्के में ले जाते हैं। ऐसे में उनके अनुमान कागज पर तो संतुलित नजर आते हैं, लेकिन धरातल और सोशल मीडिया पर वोटरों के अस्थिर मन से मेल नहीं खाते।
मसलन, 2024 के लोकसभा चुनाव में वरिष्ठ नेताओं और सेलेब्रिटीज के फर्जी वीडियो और ऑडियो क्लिप तेजी से फैले। जब तक तथ्यपरक जानकारी प्रभावित वोटरों तक पहुंचती, वे व्यापक रूप से फैल चुके थे। इसने बताया कि प्रचार के आखिरी दिनों में ऐसे कंटेंट कैसे जनमानस को प्रभावित कर सकते हैं।
चूंकि ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल वोटिंग की समाप्ति से काफी पहले ही अपना फील्डवर्क रोक देते हैं या बूथ से दूर पोस्ट-पाेल सर्वे की तरह एग्जिट इंटरव्यू करते हैं, इसलिए वे इस गलत सूचना के प्रसार और सुधार, दोनों को ही नहीं पकड़ पाते। खासकर उन मार्जिनल सीटों पर, जहां 1-2 प्रतिशत का स्विंग ही निर्णायक होता है।
नतीजतन, कांटे की टक्कर वाली सीटों पर पुराने, अपेक्षाकृत अधिक स्थिर मानकों पर बने सर्वे मॉडल बाद में वायरल कंटेंट के जरिए पैदा हुई लहर को सही तरीके से नहीं आंक पाते। इसीलिए वे नतीजों का अनुमान लगाने मे गलती कर बैठते हैं। हाल के चुनावों में शायद ऐसा ही हुआ, जब अनुमानों और वास्तविक परिणाम में बड़ा अंतर देखने को मिला।
चुनाव-सर्वेक्षणों की मैथडोलॉजी और विश्लेषण के तरीकों में बदलाव लाना जरूरी है, ताकि मतदाताओं के व्यवहार पर सोशल मीडिया के प्रभाव का आकलन किया जा सके। बदलते दौर के मद्देनजर इससे प्रणाली में सुधार आएगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








