एन. रघुरामन का कॉलम:  कोई न कोई हमेशा ही हमारी हिंसा की कीमत चुका रहा होता है
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एन. रघुरामन का कॉलम: कोई न कोई हमेशा ही हमारी हिंसा की कीमत चुका रहा होता है

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भोपाल की सबसे व्यस्त सड़क किसी भी शाम घर लौटने की हड़बड़ी से भरे यात्रियों की अराजक भीड़ से भरी रहती है। लेकिन इस शुक्रवार उसकी सामान्य रिदम टूटकर एक ठहराव में बदल गई। इसका कारण किसी निर्माण कार्य से पैदा हुई बाधा या प्राकृतिक संकट नहीं था, बल्कि मनुष्यों के बीच टाला जा सकने वाला एक टकराव था। एक मामूली दुर्घटना- जो कि एक चालक की लापरवाह ड्राइविंग का नतीजा थी- देखते ही देखते गुस्से और अहंकार से भरे विवाद में बदल गई। दोनों चालक सड़क के बीचोंबीच खड़े थे और एक-दूसरे से ऐसे लड़ रहे थे, मानो किसी खंदक में मोर्चा संभाले सैनिक हों। वो बहस में जीतने की बेचैन इच्छा से पूरी तरह ग्रस्त हो चुके थे। गुस्से में वो अपने आसपास की वास्तविकता से पूरी तरह अनजान हो चुके थे। उन्हें इस बात तक का एहसास नहीं था कि उनकी निजी लड़ाई ने कारों की एक लंबी और सर्पिली कतार पैदा कर दी है, जो दूर तक फैली हुई थी। कारों के भीतर बैठे लोग दरअसल उनकी नासमझी के वास्तविक शिकार बन रहे थे। उनमें शायद कोई भूखा बच्चा था, जो रात के भोजन में हो रही देरी पर रो रहा हो, या कोई गंभीर रोगी, जो डॉक्टर तक पहुंचने की कोशिश में हर बीतते मिनट के साथ अपने सीने को थामे बैठा हो। उन चालकों का क्रोध उनके लिए एक ऐसी दीवार बन गया था, जिसने उन्हें दूसरों की दुनिया को समझने से रोक दिया था। अपने अहंकार के चलते दूसरों को पहुंचाए परोक्ष नुकसान को न देख पाने की इस मानवीय प्रवृत्ति ने मुझे दुनिया के दूसरे छोर की एक हृदयविदारक कहानी की याद दिलाई। वह कहानी थी सनी की, जो मैंने हाल ही में पढ़ी थी। फरवरी में एक रूसी ड्रोन ने यूक्रेन के जपोरिज्जिया शहर पर प्रहार किया था। मीडिया ने तुरंत व्यापक आंकड़े सामने रख दिए : ध्वस्त हुई इमारतें, दर्ज किया गया नुकसान और दु:खद रूप से समाप्त हो गई मानवीय जिंदगियां। लेकिन मलबे के बीच सनी भी पड़ा था- युद्ध के आधिकारिक आंकड़ों में पूरी तरह से उपेक्षित। एक समर्पित जीवविज्ञानी और संवेदनशील राहगीर वेरोनीका कोन्कोवा ने उस उल्लू को विध्वंस के बीच दुबका पाया। उसकी बाईं आंख की दृष्टि जा चुकी थी और एक पंख बुरी तरह टूट चुका था। उसे एक गत्ते के डिब्बे में रखकर अस्पताल पहुंचाया गया। सनी का पंख काटना पड़ा। अब वह प्रकाश पर प्रतिक्रिया नहीं कर सकता था। घने जंगल में उड़ने के बजाय अब वह अपने बाड़े की जमीन पर अटपटे ढंग से फुदकते हुए दिन बिताता है। वह अन्य घायल और मूक शरणार्थियों के साथ एक त्रासदपूर्ण समुदाय के साथ रहता है : दुर्लभ इम्पीरियल ईगल, ब्लैक काइट्स, पेरेग्रिन फाल्कन्स, बजर्ड्स, स्क्रीच और टॉनी उल्लू। हमारे युद्ध वन्यजीवन के स्वाभाविक व्यवहार को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देते हैं। प्रवासी पक्षी सक्रिय युद्ध-क्षेत्रों के इर्द-गिर्द रास्ता खोजने की कोशिश में स्वयं को थका डालते हैं, बड़े स्तनपायी जीव विस्फोटों की भयावह गर्जना से डरकर जोखिम भरी मानव बस्तियों की ओर भटक आते हैं, और समुद्री जीवन भी पानी के भीतर होने वाले विस्फोटों से प्रभावित होता है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वेरोनीका कोन्कोवा की देखभाल में मौजूद कोई भी पक्षी अब कभी जंगल में लौट नहीं सकता। उनकी स्वाभाविक प्रवृत्तियां उनसे छीन ली गई हैं; अब वे दिन में दो बार भोजन पाने के लिए स्थायी रूप से मनुष्यों पर निर्भर हो चुके हैं। यहां तक कि जंगलों में बचे हुए जानवर भी अस्वाभाविक व्यवहार करने लगे हैं। उनके व्यवहार में आए मनोवैज्ञानिक बदलावों को मोर्चे पर मौजूद सैनिक-जीवविज्ञानियों ने प्रत्यक्ष दर्ज किया है। प्रकृति की दुनिया न तो युद्धविराम पर बातचीत कर सकती है और न ही किसी संधि पर हस्ताक्षर; वह बस मानवीय हिंसा के भारी पदचिह्नों के नीचे चुपचाप क्षीण होती जाती है। चाहे भोपाल में दो क्रोधित ड्राइवर किसी महत्वपूर्ण सड़क को जाम कर रहे हों, या यूरोपीय धरती पर दो राष्ट्र मिसाइलों की बौछार कर रहे हों, या फिर बंद दरवाजों के पीछे दो माता-पिता चीख रहे हों- संघर्ष की संरचना हर जगह एक जैसी रहती है। लड़ने वाले लोगों का फोकस पूरी तरह से अपने प्रतिद्वंद्वी पर रहता है, और वे इस बात से बिल्कुल अनजान रहते हैं कि बीच में फंसे निर्दोष लोग किस कीमत पर सब कुछ झेल रहे हैं। और इस पूरे दृश्य के बीच कहीं एक कांपता हुआ बच्चा, जो माता-पिता के झगड़े के समय खुद को कमरे में बंद कर लेता है; ट्रैफिक जाम में फंसा ड्राइवर, जो अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण मेडिकल अपॉइंटमेंट तक नहीं पहुंच पा रहा है; और प्लास्टिक के फ्लोर पर फुदकता एक पंख वाला उल्लू- ये सभी वे लोग और जीव हैं, जो किसी और की हिंसा की कीमत चुका रहे हैं, जबकि उन्होंने कभी इसकी मांग नहीं की थी। फंडा यह है कि मनुष्य की हर हिंसा में कोई तीसरा उसकी कीमत चुका रहा होता है। क्या हम लड़ाई शुरू करने से पहले उनके बारे में भी सोच सकते हैं?



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