एन. रघुरामन का कॉलम:  क्या होता है, जब कोई मोबाइल से नजरें हटा कर आसपास भी देखता है?
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एन. रघुरामन का कॉलम: क्या होता है, जब कोई मोबाइल से नजरें हटा कर आसपास भी देखता है?

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

क्या आपने गौर किया है कि रेलवे स्टेशन या बस अड्डे पर ज्यादातर लोग अपनी ही दुनिया में डूबे रहते हैं। या तो फोन देख रहे होते हैं, या ध्यान कहीं और होता है। ऐसे में वो न पोस्टर देख पाते हैं, न अनाउंसमेंट ही सुन पाते हैं। अगर कोई उनसे पूछे कि ‘क्या आपने यहां बैठे किसी बुजुर्ग को देखा था’ तो वह सहज ही ‘नहीं’ में सिर हिला कर फिर मोबाइल में खो जाते हैं।

20 मई 2025 को मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर यही हुआ, जब चार साल की आरोही हल्के गुलाबी रंग की फ्रॉक पहने हुए अपनी मां की गोद में सो रही थी। यह उस तीन सदस्यीय परिवार के लिए एक छोटी-सी ट्रिप थी।

परिवार महाराष्ट्र में सोलापुर का निवासी था, जो आरोही के पिता के मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए मुम्बई आया था। मई जैसे गर्म महीने में छोटे शहरों के लोगों के लिए टैक्सी के लिए पर्याप्त पैसे के बिना मुम्बई घूमना और वापस टर्मिनस पर लौटना आसान खेल नहीं है।

बहुत-से लोग थक जाते हैं। ऐसा ही आरोही की मां के साथ हुआ। उनकी आंखें पल भर के लिए लगी होंगी और खुलीं तो आरोही गायब थी। उनकी चीख ने सभी को चौंका दिया। लेकिन उनके आस-पास फर्श पर बैठे लोगों ने कुछ नहीं देखा, अधिकतर तो अपने मोबाइल में तल्लीन रहे।

पंद्रह दिनों तक पुलिस ने तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। फिर रिटायर्ड पुलिस कांस्टेबल राजेश पांडे को यह केस सौंपा गया, क्योंकि पुलिस के पास दूसरे कई और काम थे। पांडे पहले भी कई गुमशुदा बच्चों और मानव तस्करी जैसे केसों पर काम कर चुके थे।

उन्होंने मुंबई के हर उपनगरीय स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज खंगाल कर तलाश शुरू की। इन फुटेज में वो दिखा, जो आंखों से नहीं दिख पाया। एक आदमी आराम से चलता हुआ आया और बच्ची को लालच देकर ले गया। मिनटों में वह मुंबई के रेलवे स्टेशनों की भीड़भाड़ में गायब हो गया। केस दर्ज हुआ और तलाश शुरू हुई।

सीसीटीवी से पता चला कि किडनैपर लोकमान्य तिलक टर्मिनस (एलटीटी) से वाराणसी जाने वाली ट्रेन में चढ़ा था। तलाश अब कई राज्यों में फैल गई। एलटीटी, भुसावल, इटारसी, जबलपुर, प्रयागराज, बनारस और वाराणसी जंक्शन, हर जगह के फुटेज खंगाले गए।

टीमें बंटीं, री-ग्रुप हुईं और फिर बंटीं। कोई मध्य प्रदेश गया, कोई उत्तर प्रदेश रुका। किडनैपर की वह धुंधली-सी तस्वीर सैकड़ों बार दिखाई गई, लेकिन किसी का ध्यान ही नहीं गया। पड़ताल ठंडी पड़ गई और पांडे के सुराग पर वाराणसी गई टीम भी जून में खाली हाथ लौट आई।

फिर 13 नवंबर 2025 को वाराणसी में एक स्थानीय पत्रकार ने रेलवे स्टेशन पर मुंबई से गुमशुदा बच्ची का पोस्टर देखा। वह रुक गया। उसके दिमाग में कुछ कौंधा। उसने सोचा कि कुछ महीने पहले एक स्टोरी के लिए अनाथालय की विजिट के दौरान क्या उसने एक बच्ची को मराठी में बड़बड़ाते नहीं सुना था? उसने तुरंत पुलिस को फोन किया।

अगली सुबह मुंबई पुलिस वीडियो कॉल पर थी और सामने गुलाबी फ्रॉक में एक छोटी बच्ची थी। वही गुलाबी फ्रॉक। ये कैसे हुआ? दरअसल, रेलवे स्टेशनों पर अनाउंसमेंट सुनकर किडनैपर को लगा कि मुंबई पुलिस उसे तलाश रही है तो वह घबरा गया और बच्ची को मंडुवाडीह (अब बनारस) स्टेशन पर छोड़कर फरार हो गया।

जीआरपी ने बच्ची को बरामद कर लहुराबीर के अनाथालय भेज दिया था। अपहरणकर्ता अभी भी फरार है। 14 नवंबर को बाल दिवस पर मुंबई क्राइम ब्रांच के अधिकारी गुब्बारे और नई फिरोजी फ्रॉक लेकर मुंबई एयरपोर्ट पर आरोही का इंतजार कर रहे थे।

फंडा यह है कि अपने सामाजिक दायित्व के तौर पर सार्वजनिक जगहों पर कम से कम कुछ देर के लिए अपनी आंखें खुली रखिए। किसे पता आप किसी को अपहृत होने से बचा लें या गुमशुदा हुए किसी व्यक्ति को पहचान कर उसे परिवार से मिला दें।

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