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- N. Raghuraman’s Column Why Do Even Good Managers Fail To Get Promoted?
11 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
फरीदाबाद की एक इंडस्ट्री में एक डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर (एमडी) ने एक ऑपरेशनल जनरल मैनेजर (जीएम) के काम से प्रभावित होकर उन्हें टॉप मैनेजमेंट में प्रमोट करने का मन बनाया। प्रमोशन के लिए एमडी को सिफारिश भेजने से पहले उन्होंने जीएम को एक अनौपचारिक रिव्यू के लिए बुलाया।
जीएम ने रिव्यू में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि उन्हें पता ही नहीं था कि यह प्रमोशन प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जब ग्रुप की प्रमोशन लिस्ट आई तो उसमें जीएम का नाम नहीं था। जानते हैं कि इस दौड़ में वे क्यों पिछड़े? क्योंकि एमडी के आखिरी सवाल ने उनका प्रमोशन रोक दिया।
सवाल था कि यदि आपको साल भर के लिए कहीं और भेजा जाए तो आपकी जिम्मेदारी कौन संभालेगा? जीएम का जवाब था कि ‘कहां सर, बीते कई सालों में मैं ऐसा एक भी व्यक्ति देख ही नहीं पाया, जो मेरी जगह ले सके। इस बाजार में जीएम बन सकने वाला कर्मचारी मिलना ही मुश्किल है।’ शायद उन्हें लगा कि वह अपनी उत्कृष्टता साबित कर रहे हैं और बता रहे हैं कि उन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता।
लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने अपनी कमजोरी साबित की, जो प्रमोशन में बाधा बन गई। तो मैनेजर्स की दुनिया में आपका स्वागत है- जहां वे अपना कौशल तो शानदार तरीके से दिखाते हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारी दूसरों को सौंपने में विफलता के कारण ग्रुप के भीतर प्रतिभाओं को नहीं पहचान पाते। जिम्मेदारी डेलिगेट करने की क्षमता एक अच्छे मैनेजर की पहचान होती है।
पारंपरिक सोच यही है, लेकिन यदि डेलिगेशन इतना ही अच्छा है तो यह अकसर गलत क्यों हो जाता है? अपने आसपास देखिए, ज्यादातर मैनेजर इसी डेलिगेशन ट्रैप में फंसते हैं। वे डेलिगेशन को ऑन-ऑफ स्विच जैसा समझते हैं। मतलब, कर्मचारी को काम सौंपते ही वो खुद इससे पूरी तरह अलग हो जाते हैं।
सोचते हैं कि कर्मचारी सब सही कर लेगा और ऐसा नहीं होता तो हताश होते हैं। ऐसा नहीं कि उस जीएम ने कभी किसी को जिम्मेदारी ना सौंपी हो। लेकिन शायद उन्होंने पूछा हो कि ‘यदि मुझे बच्चे की तरह उनका हाथ पकड़कर सिखाना पड़े तो क्यों न मैं खुद ही कम समय में यह काम कर लूं।’ लेकिन यही उनका सबसे बेवकूफी भरा निर्णय था।
अगर आप भी उस जीएम की भांति ही सोचते हैं तो कंपनी के लिए समस्या टीम नहीं, आप खुद ही हैं। जिम्मेदारी सौंप कर गायब हो जाने के बजाय विशेषज्ञ एक रणनीति सुझाते हैं, जिसे ‘डेलिगेशन डायल’ कहा जाता है। यह एक स्टेप-बाय-स्टेप तरीका है, जिसमें यह तय किया जाता है कि जो काम आप सौंप रहे हैं, उसे करने के लिए कर्मचारी में कितना ज्ञान, कौशल और अनुभव है। फिर उनसे पूछा जाता है कि वह यह काम कैसे पूरा करेंगे।
अगर आपको तरीका गलत लगे तो उन्हें स्टेप-बाय-स्टेप बताएं कि काम कैसे पूरा होगा। यह भी समझाएं कि काम को उसी तरीके से करना क्यों जरूरी है। अब कर्मचारी को खुद करने दें। अगला स्तर ‘कोच’ होता है, जहां आप सौंपा गया काम कर्मचारी को करने देते हैं, लेकिन सवालों के जरिए उसे कोच करते हैं। मसलन, ‘आपने और क्या विकल्प सोचे थे?’ ‘आपने यही तरीका क्यों चुना?’
फिर अंतत: एक ‘सेफ्टी नेट’ होता है, जिसमें कर्मचारी को सीधे आपको रिपोर्ट करने के लिए कहा जाता है। फिर पूछें कि बताइए, कौन-सा काम, कैसे किया? कहां पर बाधा आई और क्यों? नया काम करते वक्त वह समग्र तौर पर कितने सहज रहे? यदि कर्मचारी की क्षमता को लेकर कोई संदेह हो तो बेहतर होगा काम को हिस्सों में बांट कर दें। डेलिगेशन डायल इस्तेमाल करने से तीन लक्ष्य पूरे होते हैं- खुद का काम घटता है, टीम ग्रो करती है, अंत समय की हड़बड़ी के बिना काम की गुणवत्ता सुधरती है।
फंडा यह है कि एक सफल मैनेजर के पास हमेशा त्रिस्तरीय रणनीति होती है- विभागीय काम समझदारी से डेलिगेट करना, बुद्धिमता से सीनियर की भूमिका सीखना और अपने पद के लिए विकल्प तैयार करना।








