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- N. Raghuraman’s Column How To Prevent Students From Cheating With AI Tools?
7 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मैं एक ऐसी महिला को जानता हूं जो लैटर लिखने का काम करती थीं। इससे वो अच्छा कमा लेती थीं। वो आईवी कॉलेजों (हॉर्वर्ड, ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित कॉलेज) में दाखिला लेने के इच्छुक छात्रों के लिए ‘लेटर ऑफ पर्पस’ (एलओपी) लिखती थीं।
वो उनमें से थी, जिनके पास दोस्तों तक के फोन उठाने का वक्त नहीं होता था, खासकर भारत में हाई स्कूल के रिजल्ट के बाद। उनका रिकॉर्ड था कि उनके किसी भी स्टूडेंट का आईवी कॉलेज में आवेदन निरस्त नहीं हुआ। वो छात्रों का व्यक्तिगत साक्षात्कार करतीं, उन्हें समझतीं, फिर एलओपी तैयार करतीं।
इसके अलावा, छात्रों को दो घंटे की व्यक्तिगत कोचिंग देतीं कि इंटरव्यू में कैसे पेश आएं, संभावित सवाल क्या हो सकते हैं। असल इंटरव्यू से चंद घंटे पहले पर्सनल कोचिंग फिर दोहराती। ताज्जुब की बात नहीं कि उनकी फीस भी बहुत थी।
दरअसल, जो भी स्टूडेंट दुनिया के अच्छे कॉलेजों में दाखिला लेना चाहते हैं, उन्हें दमदार एलओपी जमा करना होता है, उसके आधार पर कॉलेज एडमिशन तय करता है। पर 2025 में वो बेरोजगार हो गईं! कल रात एक डिनर पर मेरी उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने इस बारे में बताया।
जब मैंने आश्चर्य व्यक्त किया, तो उन्होंने फीकी हंसी में कहा, “ओपनआई के चैटजीपीटी ने मेरी नौकरी छीन ली है। साल 2022 के नवंबर से इसने धीरे-धीरे मेरी नौकरी छीनना शुरू कर दिया, लेकिन मैंने तब इस पर ध्यान नहीं दिया। और अब 2025 में, मेरे पास छात्र नहीं आ रहे। अब केवल वही छात्र आते हैं, जिन्हें कॉलेजों ने खारिज कर दिया है और मुझे उन्हीं स्टूडेंट्स को किसी अन्य यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलाने के लिए दोगुनी मेहनत करके प्रशिक्षित करना पड़ रहा है।’
उनके साथ हुई बातचीत ने मुझे कई कॉलेज के प्रोफेसरों के साथ हुई चर्चाएं याद दिला दी। उन प्रोफेसर्स ने ये माना कि तकनीक से छेड़खानी के मामले में उम्रदराज प्रोफेसर छात्रों से एक कदम पीछे रहते हैं। उनका कहना है कि “निबंध लेखन, होमवर्क, प्रोजेक्ट रिपोर्ट और पीपीटी में भी चीटिंग का पता लगाना मुश्किल होता है।’
यहां तक कि छात्रों के आर्टफिशियल तरीके से तैयार कंटेंट को टूल्स का इस्तेमाल करके भी पहचानना मुश्किल हो रहा है। प्रोफेसर्स दुखी होकर कहते हैं, जब स्टूडेंट्स अपना मुंह खोलते हैं और अंग्रेजी में बात करते हैं, जो कि पहले ही वह अपने प्रोजेक्ट में लिख चुके हैं, तब जाकर हमें पता चलता है कि प्रोजेक्ट में इस्तेमाल कंटेंट टेक्नोलॉजी की मदद से कॉपी किया गया है।
इस बीच study.com के एक सर्वे से पता चला है कि 89% कॉलेज छात्र असाइनमेंट पूरा करने के लिए चैटजीपीटी का उपयोग कर रहे हैं। इस तकनीक का उपयोग करने वाले छात्रों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, उनमें से 72% कहते हैं कि वे नकल पर आधारित शिक्षा नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि चैटजीपीटी को कैंपस में बैन किया जाए। तो, क्या किया जा सकता है? कई विशेषज्ञों ने कई सुझाव दिए हैं, लेकिन शीर्ष पांच बिंदु हैं: 1. उन शैक्षणिक तरीकों की ओर लौटें, जो सदियों से शिक्षकों का साथ देते आ रहे हैं। 2. विश्वविद्यालयों को मूल्यांकन के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। 3. प्रोफेसर्स को कक्षाओं में बातचीत का कल्चर फिर खड़ा करना होगा। उच्च शिक्षा के लिए मौखिक संचार हमेशा से अच्छा मॉडल रहा है। अलग-अलग स्ट्रीम के स्टूडेंट्स के बीच डिस्कशन होगा, तो तार्किक परिचर्चाएं विश्वविद्यालय शिक्षा के केंद्र में होंगी। 4. छात्रों को प्रश्न पूछने-आइडिया शेयर करने दें, इससे कक्षाएं सार्थक होंगी। 5. उन्हें सिखाएं कि पैसे कैसे कमा सकते हैं। कुछ लोग इस पर आपत्ति कर सकते हैं। पर बता दूं कि जब क्रिकेटर आठ अंकों में कमाता है, तो केवल कक्षा का सैद्धांतिक ज्ञान उन्हें पीछे छोड़ देता है। इसलिए शुद्ध ज्ञान से नैतिक रूप से पैसे कमाने को प्रोत्साहित करें।
फंडा यह है कि जो छात्र बिना किताबें पढ़े क्विज में टॉप करता है, उसने कुछ नहीं सीखा होता। तकनीक पर निर्भर छात्र न केवल ज्ञान हासिल करने में विफल होते हैं, बल्कि रचनात्मक और आलोचनात्मक सोच की क्षमताओं का भी विकास नहीं कर पाते। छात्रो, ये आपका चुनाव है कि आपका मार्गदर्शक कौन होगा- प्रोफेसर या तकनीक? इस पर विचार करें।








