एन. रघुरामन का कॉलम:  डाउनसाइजिंग का अपना ही अपसाइड भी होता है!
टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: डाउनसाइजिंग का अपना ही अपसाइड भी होता है!

Spread the love


1 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कुछ साल पहले जब मेरी बेटी की शादी होने वाली थी, तो मेरी पत्नी ने मुख्य हॉल में हमारे 28 साल पुराने फर्नीचर को बदलने का फैसला किया। हालांकि मैं इसके बिल्कुल पक्ष में नहीं था। मैं उस फर्नीचर से दो कारणों से भावनात्मक रूप से जुड़ा था।

1. वे किसी यूज-एंड-थ्रो शोरूम से नहीं लाए गए थे कि उनकी लकड़ी टूट गई हो या रंग फीका पड़ गया हो। वे ठोस साग की लकड़ी से बने थे।

2. वे हमारे संघर्ष के दिनों की कई यादों को बयां करते थे, जब हमने बहुत सोच-विचार और चर्चाओं के बाद उन्हें एक-एक कर बनवाया था। इसलिए वे अलग दिखाई देते थे। जाहिर है कि वे एक फर्नीचर-सेट की तरह नहीं दिखते थे और इसके बजाय समय-समय पर जुटाई गई चीजों की तरह नजर आते थे।

यही मुख्य कारण था कि मेरी पत्नी उन्हें बदलकर एक ही डिजाइन वाला फर्नीचर-सेट चाहती थी। डिजाइनर ने ऑर्डर लिया और चला गया। लेकिन नया फर्नीचर आने तक उसने हमें पूरा हॉल खाली करने का काम सौंप दिया।

यह मेरे लिए एक मुश्किल चुनौती थी। सौभाग्य से, हम एक ऐसी स्त्री को जानते थे जो अपने करियर में संघर्ष कर रही थीं और मुंबई शिफ्ट होने जा रही थीं। उनका तलाक हो चुका था और वे आर्थिक रूप से इतनी मजबूत नहीं थीं कि अपने घर को उसी स्तर पर फिर से बना सकें, जैसे घर में उनके वैवाहिक जीवन के दौरान वे और उनके दो बच्चे रहते थे।

एक मामूली नौकरी के साथ बच्चों को वह सुविधा देना उनके लिए कठिन था। हमने अपना फर्नीचर बदलने का फैसला करने से पहले ही उनसे यह वादा कर दिया था कि हम सेटल होने में उनकी मदद करेंगे। उनके सेटल-डाउन होने के लगभग दो सालों के दौरान उन्होंने हमसे कुछ सामान लिया, लेकिन सभी नहीं, क्योंकि उनका घर बहुत छोटा था। लेकिन उन्होंने हमें सुझाया कि हमें इसके लिए सही लोगों की तलाश करनी चाहिए, जो ऐसी चीजों को बहुत पसंद करेंगे- रसोई के मिक्सर से लेकर छत के पंखों और डाइनिंग टेबल से लेकर सोफा सेट तक।

मेरा यकीन कीजिए, हर बार जब मैं उन अलग-अलग विनम्र लोगों के पास जाकर उनसे कुछ साझा करता था, तो मेरा मामूली घर मुझे महल की तरह लगते लगता था। मेरी लिखने की मेज पाने वाले प्राप्तकर्ता ने कहा, मैं अपने पिता के लिए ऐसी ही मेज खरीदना चाहता था ताकि वे बैठकर अपना सुबह का अखबार पढ़ सकें।

अपने बूढ़े घुटनों के चलते वे फर्श पर बैठकर नहीं पढ़ पाते हैं। मेरी आंखों में एक मिनट के लिए तब आंसू आ गए, जब मैंने उन बुजुर्ग व्यक्ति की आंखों में देखा। मेज पर बैठकर वे उतने ही रोमांचित थे, जैसे कोई बच्चा अपने पसंदीदा खिलौने को पाकर होता है।

एक और आंटी थीं, जिन्हें नहीं पता था कि एक किचन-मैट उनके दुखते पैरों को आराम दे सकता है। वे नियमित रूप से तस्वीरें भेजती थीं कि कैसे वे खड़े रहकर खाना पकाती हैं और उन्हें ऐसे व्यंजन बनाना पड़ता है, जिनके लिए घंटों खड़े रहकर समय देना पड़ता है।

एक दिलचस्प घटना तब हुई, जब एक मां ने हमें दिल से धन्यवाद दिया। उनका बेटा पढ़ाई में कम दिलचस्पी रखता था, लेकिन मेरी बेटी की स्टडी टेबल का इस्तेमाल करने के बाद वह पढ़ाई को लेकर गंभीर हो गया और उसने अच्छे अंक प्राप्त किए। मुझे नहीं पता था कि एक साधारण-सी स्टडी टेबल भी किसी में पढ़ने की रुचि पैदा कर सकती थी।

उन अनुभवों ने हमें अपने घर में ऐसे और भी खजानों को ढूंढने पर मजबूर कर दिया, और जो कुछ भी हमने पाया उसे आखिरकार अपना नया घर मिल गया। जूते के स्टैंड से लेकर बगीचे की कुर्सियों तक, कुछ भी कबाड़ में नहीं गया।

उन सभी के उपयोग के साल लंबे खिंच गए। जब प्राप्तकर्ता आज भी वॉट्सएप पर उन चीजों की तस्वीरें साझा करते हैं, तो मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि मेरे पास जो सामान था, वह दूसरों को खुशी दे रहा है।

फंडा यह है कि जब आप अपना कई बार इस्तेमाल किया हुआ और कभी-कभी अपेक्षाकृत नया सामान भी किसी को देते हैं, तो वे बदले में लौटकर आपको कुछ अच्छी यादें और बेहतरीन कहानियां देते हैं। और इसलिए मुझे लगता है कि डाउनसाइजिंग में भी अपसाइड होने की कहानी निहित होती है, जिसमें किसी पर ध्यान दिया जाता है और उनके साथ बेहतर व्यवहार किया जाता है। आपका क्या कहना है?

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *